Monday 30 November 2009

संगम पर तुम्हारा स्वागत है परिंदों

साथी शिव त्रिपाठी ने दो दिन पहले जब जब यह तस्वीर ली थी तो उन्हें परिंदों के साथ खेलता यह बच्चा सिर्फ़ रंगीन विषय भर लगा था। आज जब इसे ब्लॉग पर डाल रहा था तो मुझे इन सफ़ेद परिंदों के बीच यह बच्चा भी परिंदा ही लगा। उड़ान की बेलौस कोशिश करता। काश मै भी एक होता इन परिंदों में। उड़ सकता जी भर खुले आकाश में।

Saturday 21 November 2009

कनपुरिये माफ़ करें











काफी साल पहले किसी काम से कानपुर आया था तब भी इस शहर को लेकर मेरे मन में कोई अच्छी छवि नही बनी थी लेकिन अब भी कानपुर वैसा ही होगा, नही सोचा था। कनपुरिये मुझे माफ़ करें क्योकि हो सकता है कि मेरी कोई बात उन्हें पसंद न आए लेकिन सच ये है कि कानपुर की हालत देख कर सच में दुःख हुआ। आज जब देश के कोने कोने में आतंकवाद के नाम पर गलियों में भी पुलिस वाले आपके झोले की जांच करते दिख जाते है, मुझे इतने बड़े स्टेशन पर एक भी पुलिस वाला नही दिखा। न ही रेलवे का कोई कर्मचारी जिसने मुझसे या किसी और से टिकट मांगा हो। जहां भी निगाह गई गंदगी का ऐसा नजारा जो उबकाई ला दे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रेलवे स्टेशन के बीचोबीच खुला शौचालय हो सकता है। क्या आप सोच सकते हैं कि किसी महानगर के मुख्य स्टेशन की सड़कें महीनों टूटी फूटी रह सकती हैं। रेलवे नियमों के अनुसार गैर पंजीकृत वेंडर कैंपस के अंदर नहीं आ सकते लेकिन यहां तो पूरा बाजार सजता है। सार्वजनिक स्थानों पर ध्रूमपान पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक है लेकिन कानपुर रेलवे स्टेशन परिसर के अंदर की कम से कम दो दर्जन अवैध दुकानें २४ घंटे बीड़ी-सिगरेट उपलध कराती हैं। होटलों के दलाल ट्रेन से उतरने का भी इंतजार नहीं करते। किसी दलाल से निगाह मिली भर नहीं कि आपके बैग पर उसका हाथ होगा, होटल वैष्णव चलिए साहब ....सब मिलेगा।
स्टेशन के बाहर का नजारा तो माशाअल्ला ऐसा कि उसे जेहन से निकालने में भी घंटों लग जाएं। स्टेशन से बाहर निकलने पर आप जैसे ही सीढ़ियों से उतरते हैं तो शहर का पहला नजारा होता है, सार्वजनिक मूत्रालय। टे्रन में घंटों टांगे दबाए लोग यहां भले ही फारिग हो कर चैन की सांस ले रहे हों लेकिन मेरी खिसियाहट उन आला अफसरों के विवेक पर थी जिन्होंने इस मूत्रालय को प्लान करते समय इतना भी नहीं सोचा कि स्टेशन सिर्फ पुरुष नहीं आते। यात्रियों में औरते भी होती हैं। वे बेचारी जिस मजूबरी में वहां से आंख चुरा कर और नाक बंद करके गुजरती हैं, वह सभ्य समाज को शोभा नहीं देता।इसमें दो राय नहीं कि कानपुर के चौपट हो चुके उद्‌योग ने शहर की अलमस्ती छीन ली है। यहां-वहां बंद फैट्रियां, ढहे मकान, जंग लगे उनके दरवाजे यूं भी शहर में एक नकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं लेकिन क्या जीने का सलीका भी हमें दूसरों से उधार लेना पड़ेगा। जिस शहर में सिमरन बनाने वाले वैज्ञानिक हों, जहां देश के शीर्ष रोबोटिक्स शोध चल रहे हों उसी शहर में अब भी भवन निर्माण के दौरान सामग्री ढोने के लिए खच्चरों का इस्तेमाल होता हैं। शहर में ही खच्चरों की संチया तीन हजार से अधिक है। स्टेशन से विजय नगर जाते समय सड़क के किनारे फैले खच्चरों के तबेले बताते हैं कि जिम्मेदार लोगो ने कभी ने इस नजरिए से देखने की जरूरत ही नहीं समझी की शहर का एक चेहरा दिखाने का भी होता है जो कम से कम बाहरियों का दिल तो खट्‌टा करे लेकिन यहां तो सब कुछ उल्टा है। शहर की शान घंटा घर पर कूड़े का ढेर, बीच बाजार फलों के जूस के नाम पर चीनी का शर्बत और रेस्टोरेंट के नाम पर कीचट मेजों पर परोसी गई पूड़ी-सजी। अलसुबह कानपुर स्टेशन के आसपास कुछ घंटे घूम कर इस शहर को जितना जान पाया सिर्फ उतना ही लिखा है। रेव मोती और रेव जैसे मॉल शहर के चेहरे की खूबसूरती तो बढ़ा सकते हैं लेकिन पहले चेहरा मेकअप लायक तो बने।
दुख इस बात का भी हुआ कि सालों से सक्रिय राजनीति और सत्ता में भागीदार रहे श्री प्रकाश जायसवाल इस शहर का नेतृत्व करते हैं, उसके बाद भी कानपुर की स्थिति अनाथों जैसी है। सच है कि हर शहर चंडीगढ़ दिल्ली नहीं हो सकता लेकिन शहर, शहर लगे इसकी जुगत तो करनी ही होगी ताकि जब कोई दूसरे शहर वाला यहां से लौटे तो कम से कम ये न लिखे-- कानपुरिए माफ करें।
नोट--अपनी बात कहने के लिए कुछ तस्वीरें भी डाल रहा हूं। सस्ता मोबाइल है इसलिए अच्छा-बुरा आप समझना। एक बात और ,कानपुर की चाय बहुत शानदार है । कभी मौका लगे तो जरूर पीजिएगा ।

Thursday 19 November 2009

दरवाजा खुला हो या बंद


दोपहर तीन बजे का वक्त होगा। किसी काम से एक परिचित के घर दाखिल हुआ ही था कि मियां-बीवी का जोरदार झगड़ा सुनाई देने लगा। यहां पति को शक है कि पत्नी को कम सुनता है और पत्नी को लगता है कि जब तक ऊंची आवाज में बात ना करे पति पर असर नहीं होता। इसी चक्कर में दोनों का वॉल्यूम हाई रहता है।आज झगड़े की वजह छोटी थी या बड़ी, इस बारे में सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। घटना कुछ इस तरह है। इस घर के इकलौते कमरे की कुंडी ठीक से बंद नहीं होती। पत्नी जी कपड़े बदल रही थीं कि दोपहर भोज के लिए पधारे पति सीधे कमरे में प्रवेश कर गए। इससे पहले पूछा भी कि क्या कर रही हो? जवाब मिला-'जरा रुको, कपड़े बदल रही हूं।' पति को इस आदेश की पालना करना सही नहीं लगा और पति होने का हक जमाते हुए अंदर घुसते ही ऑर्डर दे डाला-'जल्दी करो, बहुत भूख लगी है। खाना गर्म करो।'पति की इस हरकत से पत्नी तिलमिला गई और युद्ध शुरू हो गया। दोनों में से सही कौन...इसके निर्णय के लिए जज बना डाला मुझे और घटना का ब्यौरा दोनों ने अपने-अपने तरीके से देने लगे। पत्नी की नजर में ये गलत था तो पति का कहना था कि पति से कैसा परदा...इसमे मै क्या बोलूं...' यह कहकर वहां से निकल लिया1 सभी की अपनी राय हो सकती हैं1 मुझे यहां पत्नी की बात ज्यादा सही लगी। कुछ लाइनें भी याद आ गईं, जो शायद निदा फाजली साहब की हैं...

अगर तुम समझते हो

बीवी घर की इज्जत होती है

तो खुदा के लिए उस इज्जत की खातिर

दरवाजा खुला हो या बंद

हमेशा दस्तक देकर ही घर में दाखिल हुवा करो

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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