Monday, 31 August 2009

फुरसतिया के ब्लॉग से।

जो बीच भंवर इठलाया करते ,
बांधा करते है तट पर नांव नहीं।
संघर्षों के पथ के यायावर ,
सुख का जिनके घर रहा पडाव नहीं।
जो सुमन बीहडों में वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते,
जो दीप उम्र भर जलते हैं
वो दीवाली के मोहताज नहीं होते।

मानसिक हलचल में पढ़ा

कोई वर्तमान नहीं है। केवल भूत है या भविष्य। आप चाहे जितना बारीकी से समय को छीलें, या तो वह हो चुका है, या होगा। तब वे लोग जो दावा करते हैं कि वे वर्तमान में जीते हैं, किसमें रहते हैं? भूतकाल उन्हें संज्ञाशून्य कर देता है यह विश्वास करने में कि वह अब भी चल रहा है। और वे उसे वर्तमान कहते।समय उड़ रहा है। भविष्य तेजी से भूतकाल बन रहा अपने भूतकाल की उपलब्धियों पर विश्राम करना सरल है। यह और भी सरल है कि कोसा जाये भविष्य के अंधकार।

Sunday, 30 August 2009

खिड़की

खिड़की बाहर खुलती है वह अंदर को बाहर देखने के जरिये जोड़ती है। बाहर है यह अंदर को याद रहे। बाहर को यह अहसास बना रहे कि अंदर है। खिड़की अंदर और बाहर दोनों को एक दूसरे का एहतराम करने का एक सीधा-साधा अवसर है। आकाश हर घर पर छाया है पर कई बार वह खिड़की से दिख पड़ता है। खिड़की के द्वारा घर आकाश को याद करता है। यह भी कि आकाश खिड़की से होकर घर से अंतरंग बनकर प्रवेश करता है। खिड़की से जो बाहर का दृश्य का दिख पड़ता है वह चुपचाप घर में दाखिल हो जाता है। उसी रास्ते के अंदर जो हो रहा है उसका कुछ हिस्सा फिसल जाता है। कई बार घर के अंदर से हम खिड़की के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ देख पाते हैं जिसे हमने देखा। यह न देखे हुए को पता, न किसी और को। खिड़की एक गोपन दृष्टि हो सकती है। एक आँख जो देखती है और जिसे देखते हुए कोई और नहीं देख पाता। खिड़की रहस्य को छिपाना और भेद का न खोलना जानती है। अगर वह चाहे तो भेद खोल भी सकती है। खिड़की खतरनाक हो सकती है। कविता संसार की अनंत पर खिड़की है। उस निरंतरता को जो है, हम अगर यह खिड़की न होती तो शायद अलक्षित ही जाने देते। हम चाहें तो इस खिड़की से दृश्यावलोकन कर सकते हैं। हम अनंत देख सकते हैं। पर खिड़की का दृश्यता का और अनंत का होना हमारे झांकने पर निर्भर नहीं है। खिड़की झाँकने का न्यौता है। हो सकता है कि हमे न्यौते को स्वीकार करने मे देर हो जाए। पर इस देरी से फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि कविता जिस अनंत पर खिड़की है वह बीतता नहीं है। पर झाँकना करना भी है-जो दूर देखता है वह हिस्सेदार नहीं है, यह धारणा निराधार है। झाँकते हुए हम दृश्य मे शामिल हो जाते हैं। कविता भवसागर पार करने की नौका नहीं है पर वह भवसागर की मंझधार में अनंत पा लेने का दुस्साहस जरूर है। वह जो पार और सुदूर है उसे सामने और पास लाना है-कम से कम उसकी अथक चेष्टा है।

खुराक

चमन (रमन से)- देखो पेपर में न्यूज आई है कि साइंटिस्ट लोग पता लगा रहे है कि कोई आदमी बिना दिमाग के कितने दिन जिंदा रह सकता है।
रमन (चमन से)- इसका जवाब तो बड़ा आसान है, तू बस उन्हें अपनी उम्र बता दें।

अनदेखी का शिकार पुरामहत्व स्मारक

विश्व विख्यात स्वर्ण नगरी जैसलमेर के विभिन्न भागों में प्राचीन एवं ऐतिहासिक धरोहरों का भंडार है, लेकिन अतीत की कहानी सुनाने वाली इन इमारतों की लगातार अनदेखी को रोका नहीं गया तो पुरामहत्व की अनमोल धरोहर के लिए खतरा खड़ा हो सकता है।
स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों किलों, हवेलियों और छतरियों से अटे जैसलमेर में स्थित विश्व विख्यात सोनार किले के संरक्षण को लेकर कोई विशेष प्रयास नहीं हुए है। यह सिर्फ जैसलमेर के सोनार किले की कहानी नहीं है, बल्कि जिले में कई दुर्ग भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे है। जैसलमेर में सैकड़ों शानदार प्राचीन व ऐतिहासिक स्मारक हैं और इसी विरासत के बलबूते पर विश्व के पर्यटन मानचित्र पर यह स्वर्ण नगरी उभरी है, लेकिन इन स्मारकों के संरक्षण व रखरखाव के लिए प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की पहल दिखाई नहीं दे रही है।
जैसलमेर के इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा का कहना है कि जैसलमेर विश्व धरोहर के क्षेत्र में अपनी एक अहम पहचान रखता है, लेकिन यहां की सांस्कृतिक धरोहर को विरासत के रूप में सहेज कर रखने के कोई महत्वपूर्ण प्रयास नहीं किए गए हैं। राज्य सरकार व केंद्र सरकार द्वारा प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए बना गए विभाग नाम मात्र के है।
जैसलमेर में सात हवेलियों का समूह है। सरकार ने वर्ष 1976 में तीन पूर्ण एवं एक हवेली का 42 प्रतिशत भाग अधिग्रहित किया था, लेकिन आज तक इनके संरक्षण के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। 'लिपिंग फोर्ट' के रूप में विश्व विख्यात जैसलमेर के 'सोनार किले' के संरक्षण के लिए योजनाएं बनीं, लेकिन उन पर सही रूप से अमल नहीं किया गया।
नगर पालिका व पुरातत्व विभाग में तालमेल नहीं होने से दुर्ग से पानी की निकासी की अव्यवस्था कोढ में खाज का काम कर रही है। कुछ समय पहले पुरामहत्व के स्मारकों को संवारने का काम करने वाले एक संगठन के माध्यम से तथा नगरपालिका और पुरातत्व विभाग ने सोनार किले पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित दुर्ग जर्जर हो रहे हैं। जैसलमेर जिले के मानगढ, नाचना, हड्डा किशनगढ, काणोद, लखा आदि गांवों में कई दुर्ग हैं। जैसलमेर पर्यटन व्यवसाय महासंघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ का मानना है कि सरकार एवं विरासत प्रेमी संस्थाओं द्वारा प्राचीन धरोहरों के लिए जो कुछ भी किया जा रहा है उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है। पर्यटकों का मानना है कि प्राचीन धरोहरों व स्मारकों की अनदेखी से यहां के पर्यटन को खतरा है।
अगर ऐतिहासिक विरासत को सहेजने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब इन विरासतों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में जैसलमेर के ही नहीं बल्कि भारत के पर्यटन को बहुत बड़ा झटका लग सकता है।

Friday, 7 August 2009

हाईकू

व्यस्तताओं में पूरा दिन रेत सा जाने कब बीत गया कि पालथी मार कर आपके साथ बैठने का वक्त ही नहीं मिला। फिर भी एक हाईकू आपके लिए----

मैं चूम लेता हूं
पवनदूती के अधरों को अक्सर
मुझे पता है,
तुम भी चूमती हो....

Thursday, 6 August 2009

नए नजरिए से पाकिस्तान

बुधवार को जल्दी घर पहुंचने के वायदे के बाद भी काफी देर हो गई। घर पहुंचते-पहुंचते घड़ी की सूइयां १२ का साथ छोड़ चुकी थीं सो बीवी से सिफॆ गुडनाइट ही हो सकी। मतलब यह कि देर से आने के कारण पड़ने वाली डांट से बच गया।खाने के बाद रोज की शगल में रिमोट के बटन के साथ छेड़छाड़ के बीच एक कायॆक्रम पर आंखे रुक गईं। नैटजियो की फेमस सिरीज डोंट टेल माई मदर में इस बार पाकिस्तान की बारी थी। पाकिस्तान के बारे में जब भी, जितना भी पढ़ो मन नहीं भरता। हमेशा और जानने की इच्छा होती है, (पट्टिदार जो ठहरा) , सो आंखें टीवी से चिपक गई। एक घंटा जाने कब बीत गया पता ही नहीं चला। इस दौरान पाकिस्तान को बिल्कुल नए नजरिए से देखने को मिला। ऐसे फैक्ट जो सालों से सूचनाओं के बाजार में रहने के बाद भी मेरी जानकारी में नहीं थे।
तथ्य एक-
करांची में हैदर भाई की वकॆशॉप हैं। यूं तो यह एक लेदर फैक्ट्री है, जहां हर रोज करीब सवा सौ महिलाएं (इनमें १२ सौ १४ वषॆ की लड़िकयां भी शामिल हैं) में चमड़े के सामान बनती हैं। कुछ नकाब, स्कटॆ नुमा ड्रेस, कोड़े या ऐसी ही कुछ और चीजें। दरअसल यह वकॆशॉप अमेरिका, मलयेशिया, थाईलैंड, चीन जैसे देशों के अधिकृत या अनाधिकृत सेक्स स्टोसॆ के लिए सेक्स ट्वॉय बनाती हैं। धमॆ को लेकर बेहद कट्टर छवि वाले पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कारोबार की कल्पना भी अजीब लगती हैं। हैदर बताते हैं कि वर्कशॉप में काम करने वाली किसी भी महिला को यह नहीं पता कि वह जो चीजें बना रहीं हैं, उसका इस्तेमाल क्या है। यह काम उनके लिए सिफॆ काम है। उनका मानना है कि कोई भी धमॆ कोई काम करने से नहीं रोक सकता।
तथ्य दो-
पिछले दिनों भारत के एक लोकप्रिय टीवी चैनल ने बेगम कायॆक्रम प्रस्तुत किया। इसमें जॉन इब्राहिम से लेकर अभिषेक बच्चन तक साक्षात्कार को पहुंचे। काफी हॉट और ब्यूटीफुल मानी गई इस कायॆक्रम की होस्ट बेगम को लेकर अस्सी फीसदी लोग अब भी अनजान हैं। कुछ उन्हें एक सेक्सी ओल्ड एज महिला के तौर पर जानते हैं तो कुछ औरत के वेष में पुरुष। लेकिन इस कायॆक्रम को होस्ट करने वाली बेगम दरअसल पाकिस्तान के सेलिब्रेटी अली हैं। न नर न नारी अली बेगम के नाम से ही टीवी कायॆक्रम होस्ट करते हैं। यह कायॆक्रम पाकिस्तान का सबसे लोकप्रिय राजनीतिक साक्षात्कार कायॆक्रम हैं। इस कायॆक्रम को प्रति सप्ताह करीब तीन करोड़ लोग देखते हैं। अली कहते हैं कि पॉकिस्तान में आतंकवाद, आए दिन होने वाले कत्लेआम, जेहाद इतने बड़े मुद्दे हैं कि एक पुरुष (?) के टीवी पर साड़ी पहन कर राजनीतिक हस्तियों का साक्षात्कार लेना, किसी भी तरह से धार्मिक विरोध की वजह नहीं बन पाया। वह अपने कायॆक्रम और अपने चाहने वालों के बीच खुश हैं। उनकी नजर में पाकिस्तान सिफॆ वैसा नहीं है जैसा मीडिया उसे दिखाता है।
अंतिम और बेहद दिलचस्प तथ्य-
करांची में एक मोहतरमा पाकिस्तान के सबसे हाईटेक ब्यूटी पालॆर की संचालिका हैं। मोटे पैसे वाली महिलाएं इस सैलून में आना अपनी शान समझती हैं लेकिन हो सकता हैं कि इस सैलून में पहली बार पहुंचने वाली कोई महिला डर से चीख पड़े या फिर गश खा कर गिर जाए। दरअसल इस पालॆर की सभी महिलाएं वें हैं जिन्हें उनके शौहर, मंगेतर या प्रेमी ने किसी न किसी कारण से उन्हें तेजाब, एसिड या फिर आग से जला दिया है। यह पॉलॆर अब तक पाकिस्तान की २३४ ऐसी महिलाओं के इलाज पर करोड़ों रुपये खचॆ कर चुका हैं और उन्हें ब्यूटिशयन के तौर पर स्थापित कर चुका है। दूसरे के सौंदयॆ को चार चांद लगाती इस पॉलॆर की ब्यूटिशियन आतिया की एक आंख तेजाब से गल चुकी है। उनके चेहरे का अधिकांश हिस्सी किसी पिघले हुए प्लास्टिक सा उनके गले तक लटका हुआ हैं लेकिन वह खुद को किसी से कम नहीं मानतीं, क्योंकि उनके पास दूसरों को खूबसूरत बनाने का हुनर है।ये तीनों ही बातें हो सकता है आपके के लिए सूचना भर हों लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि कराची में पालॆर चलाने वाली मोहतरमा को भारत में भी अपने पालॆर की फ्रेंचाइजी देनी चाहिए। उन तक तो पूरे पाकिस्तान से सिफॆ २३४ महिलाएं पहुंचीं, यहां तो शायद हर सूबे से इसकी दो-चार गुना महिलाएं अपनों की सताई हुई मिल जाएं। अच्छी सीख तो दुश्मन से भी ली जा सकती हैं, क्या आप मुझसे सहमत हैं ?

Wednesday, 5 August 2009

एक पुरानी कविता

मैं हूं किसी तालाब की

अनदेखी लहर,

तुम,

किसी बच्चे के हाथ से

छूटा कंकड़

जो, देता है मुझे विस्तार

किनारों तक...

Tuesday, 4 August 2009

पब्लिक प्रॉपर्टी

पिछले दिनों ओशो टाइम्स के एक पुराने संस्करण को सरसरी निगाह से पलटते वक्त ओशो की लाइनें आंखों से होकर दिल में उतर गईं, प्रवाह के साथ बहो, उसका विरोध मत करो। उसका आनंद लो। विरोध में ऊर्जा नष्ट हो जाएगी जबकि साथ बहे तो आनंद दोगुना हो जाएगा। बड़ा कन्फ्यूज था इन लाइनों को लेकर। अगर प्रवाह गलत, विध्वंसकारी और अनुचित हो तब भी क्या विरोध ठीक नहीं। क्या आनंद की तलाश में ऊर्जा का सारा बक्सा छिपा लें और दूसरे लिजलिजे कीड़ों-मकोड़ों की तरह प्रवाह में बह चलें। एक बार भी खुद को याद न आने दें कि हम सिफॆ बहने के लिए नहीं बनें हैं बल्कि ऊपर वाले ने हमें तैरने की भी क्षमता दी है।
इसी ऊहापोह में पिछले तीन-चार दिनों से न कहने का साहस हुआ और न ही सुनने का। पहले अक्षय और फिर पुनीत ने ब्लॉग पर कुछ भी नया न होने की शिकायत दजॆ कराई तो खुद भी गलती का अहसास हुआ। पुनीत ने तो स्नेह में धमकी भी दे डाली कि ब्लॉग बनते ही अब आप पब्लिक पॉपर्टी हैं। इसलिए आपको वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। साथियों ने हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है सो एक बार फिर हाजिर हूं। उम्मीद है दोस्तों के बीच अधिक से अधिक बना रहने की कोशिश करूंगा। इस वायदे के साथ कि प्रवाह के साथ सिफॆ बहूंगा नहीं, जहां ठीक लगेगा, वहां तैरूंगा भी। थोड़ा बहुत नहीं जी भर कर तैरूंगा, भले ही विपरीत प्रवाह मुझे ले ही डूबे।
आपका शेखर

Monday, 27 July 2009

चिड़िया के पंख-२(पहला अंक पढ़ने के बाद ही इस अंक से जुड़ पाएंगे )

मैंने अचानक अपने कंधे पर एक कंपकंपाता हाथ मससूस किया था। एक हाथ से अपने बच्चे को गोद में संभाले युवती ने कस कर मेरी शटॆ पकड़ रखी थी। मैं थोड़ा और संयत हो गया। मेरे लिए बाइक चलाना लगातार कठिन होता जा रहा था। घर के बिलकुल करीब पहुंच कर भी घर न पहुंच पाने का दबाव भी था। युवती मुझे रास्ता बताती रही और मैं कच्ची-पक्की गलियों से होता हुआ, एक झोपड़ीनुमा पक्के मकान के सामने रुक गया। वह धीरे से मेरे कंधे का सहारा लेकर उतर गई। बारिश की अथाह बूंदों के बीच भी उसके आंसू बिल्कुल अलग दिख रहे थे। मेरे मुंह से सिफॆ इतना निकला, घर में जाओ मैं अभी उनको लेकर भी आता हूं। उसकी अपलक आंखें बहुत कुछ कह रही थीं। मैंने बाइक मोड़ कर फिर कानपुर रोड पहुंचा। पैदल चलते युवक कुछ आगे आ चुका था। बच्चे की हालत और बुरी हो चुकी थी। मुझे दोबारा देखकर उसने एक गहरी सांस ली। किसी अनजान के साथ रात के ११ बजे पत्नी को भेजने का तनाव कोई भी समझ सकता है। युवक को लेकर करीब आधे घंटे मैं फिर उसी घर के सामने था। युवती घर के बाहर अब भी खड़ी। बच्चा गोद में नहीं था। पती और बच्चे के साथ मुझे देख उसके हाथ अचानक ही जुड़ गए। युवक भी दुआएं देता रहा। घर पहुंचते-पहुंचते साढ़े बारह हो गए। देर होने के कारण पत्नी ही हालत बुरी थी। मुझे देख उनका भय मिश्रित गुस्सा मुझ पर टूट पड़ा। वह खराब मौसम के बाद भी देर से आने के लिए मुझे कोसती रहीं। मैं कुछ नहीं बोला। चुपचाप कपड़े बदलता रहा। कभी एक मैग्जीन में ये लाइनें पढ़ी थीं।चिड़िया पतली से पतली शाख पर भी बेलौस और बिना डरे बैठती है, क्योंकि उसे उस शाख से अधिक भरोसा अपने पंखों पर होता है।मुझे बारिश में भीगी उस चिड़िया के पंखों की मजबूती अब भी कभी-कभी अपने कंधों पर महसूस होती है।

चिड़िया के पंख-१

रविवार को देर रात दफ्तर से लौटते वक्त चौफटका पहुंचा तो सहसा ही एक साल पुराना दिन याद हो आया। नाग पंचमी के दिन चौफटका पर भी गुड़िया का मेला लगता है। कितने साल से, यह तो नहीं पता लेकिन इलाके के जो लोग खुल्दाबाद गुड़िया का मेला देखने नहीं जा पाते हैं, उनके लिए चौफटका के पास सेना के खाली प्लाट में जमा गंदा पानी ही तालाब का मजा देता है। तालाब के किनारे महिला ग्राम स्कूल वाली सड़क को लपेटे मेले की मस्ती कानपुर रोड पर बामुश्किल दो सौ मीटर में ही पूरे शबाब पर होती है। आस-पास की बस्तियों ही नहीं नीवां, कंधईपुर, साकेतनगर और नीम सराय तक के अति सामान्य लोगों के लिए यह खास त्योहार जैसा ही है। इलाके में रहने वाली बड़े घरों की महिलाएं नाग पंचमी के एक दिन पहले से ही थोड़ी चिड़िचिड़ी हो जाती हैं। वजह नाग से दुश्मनी नहीं बल्कि यह कि घर की कामवालियां एक दिन पहले से दो दिन की छुट्टी पर चली जाती हैं। मेले के नाम पर बख्शीश अलग से देनी पड़ती है। इस बार तो नाग पंचमी बड़ा सूखा बीत गया लेकिन जिन्हें पिछली पंचमी याद है उन्हें तूफानी बारिश भी याद होगी। मुझे उस दिन अफिस से निकलने में ही ११ बज गए थे। घर से पत्नी कई बार फोन करके चिंता जता चुकी थीं। अचानक शुरू हुई मूलसाधार बारिश और बिजली की कड़कड़ाहट ने उन्हें भीतर तक डरा दिया था। यही कारण है कि बारिश का मूड अनूकूल न होने के बाद भी मैं आफिस से निकल पड़ा। बारिश ने चौफटका पर मेला तहस-नहस कर दिया था। जिसे जहां जगह मिली वहां सिर छिपा लिया। मेले से कुछ ही आगे बढ़ा था कि बीएसएनएल कालोनी के पास बुरी तरह से भीगे एक परिवार को देख बाइक अपने आप थोड़ी धीमी हो गई। पहला दुबला मुखिया चार साल के बेसुध हो चले बच्चे का हाथ पकड़े उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश कर रहा था। भीषण बारिश में भी जैसे-तैसे माथे तक पल्लू खींचे, उसकी पत्नी गोद में बच्चे समेटे बच्चे को किसी भी तरह बचाने की कोशिश कर रही थी। मुझसे नहीं रहा गया तो बाइक रोक ली। कहां जाओगे, मेरे इस सवाल ने युवक के बारिश से कंपकंपाते शरीर को और भी सिहरा दिया था। धीरे से बोला, नीवां। चलो मैं छोड़ देता हूं। मेरे इस प्रस्ताव पर युवक के पास कुछ पल को तो कोई जवाब नहीं था लेकिन शायद उसने मन ही मन कुछ सोच लिया था। उसने पत्नी और बच्चे को बाइक पर बैठने का संकेत दिया। उसकी पत्नी की आंखों में सवाल और भय की एक लहर एक साथ कौंध गई लेकिन बिना कुछ बोले वह धीरे-धीरे से बाइक पर बैठ गई। मैं बारिश की तेज बूंदों से बंद हो रही पलकों को जैसे-जैसे खोल कर आगे बढ़ गया। प्रीतमनगर मोड़ तक पहुंचते-पहुंचते बाइक के पहिए आधे पानी में डूब चुके थे। कॉलोनी में घुसते ही एक हिचकोले ने मुझे सिहरा दिया।

Sunday, 26 July 2009

फांट के लिए धन्यवाद.

जब से ब्लॉग बनाया है। फांट की समस्या से जूझ रहा हूं। अभी -अभी सतीश सर ने यह जादू की पुड़िया दी है। अगर जादू चला तो मेरा काम बहुत आसान हो जाएगा। किसी और को जादू की यह झप्पी चाहिए तो सतीश जी के जादू के बक्से (अरे भाई मोबाइल) पर घंटी बजा सकता है।

बस्ते में कंञ्डोम

बहुत दिन बाद छुट्टी का सदुपयोग करने शनिवार को बिना बताए एक पुराने मित्र केञ् घर गया था। दुनिया से अलग 'अवकाश चक्रञ्' होने केञ्ञ्कारण मुझे इस तरह अचानक अपने दरवाजे पर देख वे कुञ्छ अकबकाए तो लेकिन भले मानस की तरह दांत दिखाते हुए स्वागत करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। मित्र की पत्नी शहर केञ् एक औसत दर्जे केञ् स्कूञ्ल में पढ़ाती हैं। चारलृछह हजार की पगार में जीवन की पूरी ऊर्जा चूस लेने की स्कूञ्ल प्रबंधकों को लेकर उनकी खुन्नस अタसर उनकी बातों में दिखती थी लेकिन शनिवार शायद कुञ्छ ज्यादा बुरा था। औपचारिक बातचीत केञ् बीच आई बेस्वाद चाय और कुञ्छ सिल चुकेञ् बिस्कुञ्ट उनकेञ् गुस्से को साफ बयां कर रहे थे। मुझे भाभी जी केञ् गुस्से का अंदाजा तब ही हो गया था जब 'सुनो जी' की हांक केञ् बीच कुञ्छ क्षण केञ् लिए किचन में गए। लौटे तो चेहरा फक था। उन्होंने झेंप मिटाते हुए कहा था, बहुत थक गई है आज। मैनेजर ने अचानक ही आज बैग चेकिंग में लगा दिया था, यह भी कोई टीचर का काम हैं। 'सब साले....' मैंने बीच में टोक दिया। छोडि़ए भाई साहब। प्राइवेट नौकरी में ये सब तो झेलना ही पड़ता है।
माहौल सहज हुआ तो बात आगे बढ़ गई। ये बैग चेकिंञ्ग का タया मामला था भाभी जी। पहले तो वे कुञ्छ संकोच में पड़ीं लेकिन धीरेलृधीरे गुस्से की असल वजह परत दर परत बाहर निकलने लगी। 'नौवींलृदसवीं केञ् लड़केञ्लृलड़कियां और उनका दिमाग तो देखो...स्कूञ्ल बैग में जितने नोट्स नहीं हैं, उतने तो लव लेटर हैं। गोलाप्रकार लाना भूल गईं लेकिन लिपस्टिक और आईलृलाइनर लाना नहीं भूलीं.... देखो तो बद्तमीजी, १०वीं का लड़का बैग में कंञ्डोम लेकर आया था.....' धारा प्रवाह बोलती उनकी जुबान सहसा अटक सी गई। कंञ्डोम का नाम बिंदास बोलने का नारा शायद उनकेञ् गले नहीं उतरा था, सो वह कुञ्छ असहज हो गईं। माहौल फिर थोड़ा भारी हो गया। मैं भी बहुत देर तक बैठने की हिमत नहीं जुटा पाया और दुआलृसलाम करकेञ् निकल पड़ा। रात भी ठीक ढंग से सो नहीं सका। 'बस्ते का कंञ्डोम' अब भी मेरे जेहन में किसी गुबारे सा ड्डूञ्लता जा रहा है, हर पल कुञ्छ और बड़ा।

Friday, 24 July 2009

''मेरे दोस्त
मुझे अभी मत देना
शुभकामनाएं
मैं जानता हूं
कोख में ही कर दी जाएगी
इसकेञ् भ्रूण की हत्या
अभी शनि की साढ़े साती है
तो राहुलृकेञ्तु भी 
भाग्योदय केञ् द्वार पर ही अड़े हैं
अभी नタकारखाने में तूती की तरह
अनसुनी कर दी जाएंगी प्रार्थनाएं
अभी रखने दो
किसी 'आका' को सिर पर हाथ
अभी उगने दो वर्तमान की タयारियों में
मंगलकामनाओं की फसल
अभी प्रतीक्षा करो, धैर्य से
अनुकूञ्ल स्थितियों केञ् आने तक''

अपने रचना कर्म से हमेशा मेरे मन पर गहरे असर डालने वाले साथी अनिल सिद्धार्थ से उनकी ये पंタतियां आज जबरन मांगी। उन्होंने भी सह्दयता से अपने व्यस्त समय में से कुञ्छ क्षण निकाल कर मुझ पर कृञ्पा की और मेरे लॉग की शुभकामना केञ् रूञ्प में अपनी ये प्रिय पंタतियां मुझे सौंप दी। उमीद करता हूं मुझ कच्चे की लेखनी को इस शानदार लाइनों से कुञ्छ रंग मिल जाएगा।
कुञ्छ युवाओं ने आज राष्ट्रध्वज केञ् समान केञ् लिए अलग तरह का अभियान शुरूञ् किया है। वे तिरंगे को इलाहाबाद से यमुना पुल पर लगवाना चाहतें हैं। उन्होंने इसकेञ् लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी शुरूञ् किया है। दोपहर करीब एक बजे इस अभियान का नेतृत्व कर रहा अभिषेक विश्वविद्दयालय पहुंचने वाले युवाओं, शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों (कुञ्छ मीडियाकर्मियों से भी) इस अभियान केञ् लिए दस्तखत करने का अनुरोध कर रहा था। इस अपील केञ् जवाब में मुंह बिसूरते, बगलें झांकते और कन्नी काटते लोगों को देख कर जी मितला गया। किस युवा भारत की बात करते हैं हम। タया सिर्ड्डञ् पंद्रह अगस्त और छबीस जनवरी ही, तिरंगे पर सलामी ठोंकने केञ् लिए हैं। समलैगिंकता, मंदिरलृमसजिद या फिर किसी भी छोटे और कम महत्व केञ् कारणों पर भी उबल जाने वाले तथाकथित स्वाभिमानी देश केञ् स्वाभिमान केञ् नाम पर कहां चले जाते हैं।

pahalee bat

बहुत् दिनो से सोच् रहा था कि मेर भि एक् ब्लोग हो।पुनीत् ने जोर् देकर् कहा कि आज् सत्यर्थ से जरूर् मि लिय जाये सो मन् बन् गया। आज चाहे जो हो अपना ब्लोग् जरूर शुरु करूगा। सन्यओग से अंमित् ने मद्द कि और इस्के ह्री गणेश भि हो गया। काफी रोमनचित हू। उम्मीद् कर्ता हू ये दोस्ती साथ् रहेगी। 

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।