Sunday, 9 January 2011

पेट की गरमी पसर गई जिस्म पर




मेरठ आए अब सवा महीने बीत चुके हैं। इतने दिनों में जिस चीज को लेकर सबसे अधिक मेहनत करनी पड़ी, वह है लोगों और इलाकों के नाम याद रखना। खास तौर पर साथियों के उपनाम जाखड़, धनकड़ के नाम जुबान पर मुशि्कल से चढ़े। ऐसे ही रास्तों को भी समझने में अधिक सचेत रहना पड़ा। खैर नगर, लिसाड़ी गेट, मोदीपुरम, बुढ़ाना गेट, कबाड़ी बाजार और ऐसे ही कई नाम ऐसे हैं जो अब जाकर जेहन का हिस्सा बन पाए। एक बार तो अपने सीनियर फोटोग्राफर साथी चीकू ( उन्हें लोग इसी नाम से जानते हैं। वैसे उनका असली नाम अनुज कौशिक मुझे अधिक प्रभावित करता है।) से अनुरोध करना पड़ा कि वे मुझे सूचनाएं देते वक्त थोड़ा रुक रुक कर बोलें ताकि मैं वही समझ सकूं जो वह मुझे बताना चाहते हैं। उन्होंने पहले तो मेरी बात पर ठहाका लगाया और फिर मेरी मजबूरी को समझते हुए तेज बोलने की अपनी मूल आदत में थोड़ा बदलाव भी किया। अब ठीक है। वरिष्ठ साथी राजेंद्र सिंह के साथ शहर की कई गलियां घूमीं। कहीं चाट खाई तो कहीं फ्रूट चाट। रोड साइड जायका लेने की मेरी धुन को राजेंद्र सर ने पकड़ लिया था। उनके जाने के बाद मैंने एक-एक गली को अपनी ओर से रिकॉल करने की कोशिश की। किसी भी गली में यह सोच कर घुस गया कि कहीं तो निकलेगी। इसने मेरा आत्मिविश्वास थोड़ा जल्दी बढ़ा दिया।
शुक्रवार को घंटाघर से होकर वैली बाजार में घुसा। ठंड बेकाबू हो रही थी, इसलिए इनर लेना था। लोगों ने बताया वैली बाजार में मिल जाएगा। बात ठीक भी थी। एक अच्छी सी दुकान देख कर घुसा। सारे ब्रांड देखे और ग्राहकों से जाने क्यों जले-भुने बैठे दुकानदार का प्रवचन सुनते हुए इनर पसंद करके बाहर निकल आया। तंग रास्तों से वैली बाजार पहुंच तो गया था लेकिन वापस उसी ओर से लौटने की हिम्मत नहीं हुई। एक राहगीर से दिल्ली रोड का रास्ता पूछा। उसने बताया कि रास्ता शारदा रोड होते हुए सीधे दिल्ली रोड ही पहुंचेगा। यह मेरे लिए राहत की बात थी। वैली बाजार खत्म होते ही रास्ता और तंग हो गया। सामने से आने वाले हर राहगीर की निगाहें ऊपर की ओर देख पहले तो कुछ समझ नहीं आया पर जब मेरी निगाह भी ऊपर गई तो मामला साफ था। मैं अनजाने ही कबाड़ी बाजार में था। कबाड़ी बाजार यानी जिस्म की मंडी। एक-दो नहीं तकरीबन सौ लड़कियां छोटे-दड़बेनुमा कमरों की मुंडेर पर टिकी दिखीं। हैरत यह कि नीचे की दुकानों पर भरी-पूरी भीड़ थी। यह वाराणसी की दाल मंडी और इलाहाबाद के मीरगंज से कहीं अलग दृश्य था। आमतौर पर ऐसी गलियों से स्थानीय व्यापारियों और दुकानदारों के अलावा उनके ग्राहकों का ही सरोकार होता है लेकिन मेरठ में ऐसा नहीं है। यहां सड़क के दोनों ओर शहर की बड़ी और प्रतिष्ठित दुकानें भी हैं। इस सड़क से स्कूली छात्र-छात्राओं, घरेलू महिलाओं का वैसे ही आना जाना होता है, जैसे शहर के किसी और रास्ते से। शुक्रवार को पैंठ (स्थानीय मेला नुमा बाजार) भी लगता है।
ठंड बढ़ गई थी, इसलिए मैं इनर लेने गया था। जैकेट और मफलर पहले ही पहन रखे थे। रास्ते पर शायद ही कोई ऐसा था जिसका शरीर पूरी तरह से गर्म कपड़ों से ढका न हो लेकिन इस हाड़ कंपाने वाली सरदी में भी खिड़िकयों पर टंगी लड़िकयों के जिस्म अधनंगे थे। स्वेटर तो दूर जिस्म के बाजार में अपनी बोली के लिए खड़ी इन लड़िकयों ने बांह तक नहीं ढके थे। उनके स्लीवलेस ब्लाउज, गहरे कट वाले टी शर्ट और स्कर्ट्स उनकी मजबूरी की कहानी बयां कर रहे थे। ठंड के कारण सड़कों पर भीड़ कम थी। भीषण शीतलहर में शायद ग्राहक भी कम हो गए होंगे। सैकड़ों लड़कियों में शायद कुछ ही किस्मत में इतने ग्राहक आते होते होंगे जो दो जून की रोटी भर को पर्याप्त पैसा अदा करते होंगे। अधेड़ होचुकी औरतों की गाढ़ी लिपिस्टिक और करीने से सजाए गए बाल शायद उनकी वेदना जैसे ही अधिक गहरे थे। शायद इन लड़िकयों के पेट की भूख उनके जिस्म पर पसर गई है। दोनों वक्त चूल्हें गर्म हो सकें, इसलिए उनके जिस्म को ठंड नहीं लगती। एक दो बार और भी कबाड़ी बाजार से गुजरना हुआ। पारा चाहे 10 डिग्री रहा हो या फिर 3.5। लड़िकयां जस की तस तब भी वैसे ही अलगनी पर टंगी दिखीं , अपने उतारे जाने के इंतजार में।

Saturday, 4 December 2010

alvida allahabad

allahabad se mujhe pyar hai. bina shart. 1994 ke shuru ma jab bade sapne le kar aya tha tab bhi aur ab jab apne sare sapne apni hi potli me samet kar allahabad chod raha hu tab bhi. jab dobara allahabad aya tha to yaha bachpan ke yadee kheenchti thee, ab ja raha hu to utsah, umang aur khas taur par allahabad ka sikhaya hua yad aa raha hai.

alvida llahabad

Monday, 13 September 2010

वो समझ बैठे कि हम भी फरेब करते है.

उन सभी लोगो को धन्यवाद जो मेरे साथ मेरी ताकत बन कर खड़े है न कि मेरे लिए श्यापा कर रहे हैं. इसी हफ्ते ऑफिस जाते समय कुछ पंक्तिया होठो पर आयीं, आप सबके लिए मेरी ओर से .....
नज़र को फेर कर वो दिल पे वार करते हैं
और एक हम है कि उनको सलाम करते हैं.
उनके पहलु में मेरे जख्म सारे सूख गए
वो समझ बैठे कि हम भी फरेब करते है.
काट के पंख मेरे, देखो वो कैसा झूम उठा
ये अलग बात है कि हम हौसलों से उड़ते है.
उनके होने कि खबर मुझको ऐसे होती है
चाँद तारे भी जब इशारो से बात करते है.
नींद भी आँखों से कुछ रूठी हुई सी लगती है
दिन बुरे दोस्त, क्या इसी को कहते है.
प्यार में हमने निभाईं हैं, इस तरह रस्में
चरागे दिल कि रोशनी में, उनको पढ़ते हैं
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Saturday, 11 September 2010

कहा सुना माफ़

२००९ में मुम्बई में जिस फूलों वाली लड़की ने मुझे कर्ज में डाला था उसने मुझे ब्लॉग पर भी कर्ज से मुक्त नहीं होने दिया. पूरे ८ महीने बीत गए और मै लाख चाह कर भी फूलों वाली लड़की की दास्ताँ नहीं कह सका. इस दैरान समंदर में जाने कितना पानी बह गया इसलिए जी करता है कि उसका कर्जदार बना रहूं. क्या पता अपनी इस गलती से जीवन का कोई और नया सबक हासिल कर सकूं. अख़बार में पूरे १५ साल रिपोर्टिंग करने के बाद अपनी मर्जी से अब डेस्क का काम करने का निर्णय लिया है. ये सोच कर कि जिस भूपेश को कही पीछे छोड़ आया था, शायद उससे कही मुलाकात हो जाये. इसलिए कहा सुना माफ़ करियेगा. उम्मीदों का नया सफ़र शुरू कर रहा हूँ. इस उम्मीद पे कि कम से कम अपनों कि उम्मीद पे खरा उतर सकू.

Monday, 28 December 2009

Sunday, 27 December 2009

हेलो मुंबई...


आज मुंबई में दूसरी सुबह है। हम अभी तय कर रहे हैं कि एस्सेल वल्डॆ चलें या मुरुड. मैं मुरुड जाना चाहता था क्योंकि यह वही रास्ता था जिस रास्ते कासिद से होकर २६ नवंबर के कातिल मुंबई आए थे। मैं भी इस कमजोर कड़ी को देखना चाहता था। हालांकि अंत में यही तय हुआ कि एस्सेल वल्डॆ ही चलें क्योंकि बेटू उसे लेकर काफी रोमांचित हैं। ये पोस्ट सिफॆ आपको अपडेट करने के लिए डाल रहा हूं। डिटेल पोस्ट इलाहाबाद लौट कर करूंगा। सोचा तो है कि मुंबई पर पूरी सिरीज पोस्ट करूं। कर पाया तो मुझे भी मजा आएगा। वैसे कल हम मुंबई साउथ की लगभग सभी शानदार जगहों को आंखों के जरिए दिल में बसा चुके हैं। शाहरुख का घर मन्नत, उसके सामने स्थित शानदार बैंड स्टैंड, चौपाटी, एलिफेंटा, फैशन स्टीट, हाजी अली, मैरीन डाइव, सी लिंक, सुखराम फूड प्लाजा जैसे कई और नाम हैं जिन्हें डिटेल पोस्ट में शेयर करूंगा। तब तक मुंबई का एक और शानदार नजारा आपके लिए।

गुड नाइट मुंबई...


माफ कीजिएगा, इलाहाबाद से निकला तो सोचा था कि मोबाइल के जरिए आप से संपकॆ बनाए रखूंगा लेकिन उसकी नौबत ही नहीं आई। २४ दिसंबर को इलाहाबाद से सिरडी के लिए रवाना हुआ तो कुछ किलोमीटर के बाद ही खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में रहने वाली एयरटेल और वोडाफोन कंपनियों के नेटवकॆ्स ने साथ छोड़ दिया।भला हो अंबानी बंधुओं का कि फैमिली में तमाम ब्रेक्स के बाद भी रिलायंस का नेटवकॆ बिना ब्रेक्स के रहा। आज पूरे दिन साथॆक घुमक्कड़ी के बाद मुंबई को नए नजरिए से देखने का मौका मिला। रात के करीब १२ बजे हम वापस घर पहुंचे। थकी हुई मलिल्काए आला और साहबजादे कुछ ही मिनटों में सो गए। मुंबई अपनी गति से चल रही है। मैं भी काफी थक चुका हूं लेकिन आशू का लैपटाप देखकर दिल हुआ कि मुंबई को कम से कम गुड नाइट जरूर कर लूं। इलाहाबाद लौटते ही कुछ नए अनुभव सिरडी और मुंबई को लेकर आपके सामने हाजिर होउंगा। तब तक के लिए गुड नाइट मुंबई...................

Wednesday, 23 December 2009

डॉ.अजय ke 'चेहरे'




kuch बेहद शांत, kuch डरे-सहमे, kuch निश्चल तो kuch गुस्से से तमतमाए हुए। यहां चेहरे ही चेहरे हैं। जिंदगी kuch जाने कितने रंग अपनी safed -काली लाइनों में समेटे ये चेहरे हमारे आस-पास ke ही हैं। उसी भीड़ का हिस्सा जिसमें हम-आप भी एक शिनाkhaत भर हैं। एक चित्रकार ke तौर पर डॉ. अजय जैतली ने इन चेहरों को पढऩे से बड़ा जो काम किया है वह है इन चेहरों ke पीछे छिपे चेहरों की तलाश यानी 'बियांड faces । इलाहाबाद विश्वविद्‌यालय ke दृश्य कला विभाग ke अध्यक्ष और चित्रकार डॉ. अजय जैतली की तीन दिवसीय प्रदर्शनी 'बियांड पᆬेसेस' मंगलवार से निराला सभागार में शुरू हुई। इसे देखने वᆬुछ नामचीन, kuch विषय विशेषज्ञ तो वᆬुछ कला जिज्ञासु भी पहुंचे। चित्रों को देखकर उनका अपना अंतस भले ही अलग-अलग ढंग से भीगा हो लेकिन कला की एक ताजी बयार शायद सभी को छू कर निकल गई। चारकोल और पेस्टल कलर की आड़ी-तिरछी लाइनों वᆬे बीच से झांकते लाल, नीले, हरे और गहरे बैंगनी 'चेहरे' शायद किसी और ही लोक की रचना करते दिखते हैं जबकि ये चेहरे हैं हमारे आस-पास ke ही। डॉ. अजय की पहचान की शायद वजह भी यही है कि आम सजेタट को भी बेहद खास अंदाज में पेंट करते हैं। पूरी तरह से अलहदा। उद्‌घाटन ke बाद साहित्यकार-पत्रकार प्रदीप सौरभ भी डॉ. अजय वᆬे चित्रों पर वᆬुछ ऐसी ही टिप्पणी करते हैं,' अजय ने इन चित्रों ke लिए पेस्टल और कोयले का इस्तेमाल किया है। इसमें टूल्स, ब्रश नहीं बल्कि उंगलियां बनती हैं-यानी सब kuch डायरेタट दिल से।' खुद डॉ.अजय भी अपने चेहरों ke बारे में बताते हैं 'मैं हर चेहरे की जिंदगी की लड़ाई में शामिल हुआ।

Wednesday, 2 December 2009

इसरार भाई उर्फ़ 24x7


इलाहाबाद में नवाब युसूफ रोड पर एक शॉप है, सरस्वती आटो सर्विस । कल दोपहर में समय मिला तो सोचा गाड़ी साफ करा लूँ। शॉप पर भीड़ काफी थी। मुझे लगा कम समय में मेरा काम नही हो पायेगा लेकिन तभी एक आवाज ने मेरा ध्यान खीचा ......ऐ बब्लू जा साहब की गाड़ी साफ कर पहले। ठीक से धोना। पोलिश भी लगा देना। मुझे थोड़ी राहत हुई ... चलो अब समय से गाड़ी साफ हो जाएगी। कुछ मिनट में ही बातचीत से पता चल गया कि मुझ पर अतिरिक्त मेहरबानी करने वाले सज्जन दरअसल इसरार भाई है। वही इस सर्विस सेण्टर के मालिक भी है। मुझ से नही रहा गया तो मैंने पूछ ही लिया...क्यो इसरार भाई ये सरस्वती सर्विस सेंटर का क्या चक्कर है....इसरार के लिए मेरा सवाल चौकाने वाला नही था, मुझ से पहले भी ये सवाल उनसे कई लोग पूछ चुके होंगे। इसरार बोले भाई साहब मेरे लोग भी नाराज़ होते है कि सरस्वती के नाम दुकान क्यो चला हो। मै सबसे यही कहता हूँ कि सरस्वती माने ज्ञान और ज्ञान माने विद्या। मै नही मानता भेद-भाव। देखिये, सबका मालिक एक है। दिन भर काम करता हूँ तो शाम को दाल-रोटी का इंतजाम हो पाता है। रोटी अल्ला कि मेहरबानी से आ रही है या सरस्वती की कृपा से इससे क्या फर्क पड़ता है। मै तो आप सबकी सेवा में 24x7 लगा हुआ हूँ। ऊपर वाला भी सेवा में मेवा की सीख देता है........... इसरार भाई जाने कब तक और न जाने क्या क्या बोलते रहे लेकिन मेरे जेहन में उनकी बात अब भी गूंज रही है.... मै नही मानता भेद-भाव। देखिये, सबका मालिक एक है। दिन भर काम करता हूँ तो शाम को दाल-रोटी का इंतजाम हो पाता है। रोटी अल्ला कि मेहरबानी से आ रही है या सरस्वती की कृपा से इससे क्या फर्क पड़ता है...............................

Tuesday, 1 December 2009

हेलमेट पहनें, सुरछित रहें




शहर की बदनाम गली का नाम है मीरगंज। आम तौर पर इस मोहल्ले का नाम लोग दबी जुबान में ही लेते है। कुछ शरीफ लोग बहाने से भी इस मोहल्ले में झाँकने की कोशिश करते है लेकिन हमारे छायाकार साथियों के लिए इस इलाके में जाने का मौका कारू के खजाने से कम नही है। चाहे वह कोल्कता का सोनागाछी हो या फ़िर मुम्बई की फाकलैंड रोड। यहाँ की तस्वीरें छाप पाने वाला किस्मत वाला छायाकार माना जाता है। सिल्वर स्क्रीन के सच से बिल्कुल अलग। न पारो की तरह और न ही उमराव जान की तरह। यहाँ न महल से दिखने वाले कोठे है और न ही पान चबाती बाई। यहाँ तो हर किसी को दो जून की रोटी के लिए भी जाने कितने बार अपने गर्म शरीर पर वासना की रोटियां सिकवानी पड़ती है। जानवरों के दरबे जैसी जगह पर उम्र बितानी पड़ती है। आज विश्व एड्स दिवस पर एक संस्था के प्रतिनिधि का फ़ोन आया कि वह मीरगंज में हेलमेट बाँटना चाहते है। साथी अनुराग चौके कि मीरगंज में भला हेलमेट का क्या काम।खैर कुरेदा तो पता चला कि वह दरअसल कंडोम को हेलमेट कह रहे है। उन्हें कंडोम कहने में शर्म आ रही थी इसलिए वो कोड में बोल रहे थे। ये मौका भला कोई क्यो छोड़ना चाहेगा इसलिए इस शोर्ट नोटिस पर ही संस्था के तीन प्रतिनिधियों को कवर करने के लिए दो दर्जन छायाकार मीरगंज पहुँच गए। संस्था के लोगो ने कंडोम काम पैक निकाल लिया। उन्हें संकोच भी हो रहा था। एक ने धीरे से एक मीरगंज वाली को बताने कि कोशिश की कि कंडोम कैसे लगाया जाता है। फ़िर क्या था बात उसके दिल को लग गयी। बोली .... तुम क्या बताओगे बाबु , जाओ अपना काम करो हमें पता है, कैसे लगाया जाता है। चले आए फोटो खिचवाने ... हमारी भी कुछ इज्ज़त है... कमरे में तो रोज़ नंगे होते है अब सड़क पर भी नंगा करोगे क्या...........ढेर सारी औपचारिकता कुछ मिनटों में ख़त्म हो गया। कैमरे बैग में चले गए। कुछ चटपटी तस्वीरें फ़िर नही मिल सकी । मीरगंज फ़िर आबाद हो गया बिना हेलमेट के।

Monday, 30 November 2009

संगम पर तुम्हारा स्वागत है परिंदों

साथी शिव त्रिपाठी ने दो दिन पहले जब जब यह तस्वीर ली थी तो उन्हें परिंदों के साथ खेलता यह बच्चा सिर्फ़ रंगीन विषय भर लगा था। आज जब इसे ब्लॉग पर डाल रहा था तो मुझे इन सफ़ेद परिंदों के बीच यह बच्चा भी परिंदा ही लगा। उड़ान की बेलौस कोशिश करता। काश मै भी एक होता इन परिंदों में। उड़ सकता जी भर खुले आकाश में।

Saturday, 21 November 2009

कनपुरिये माफ़ करें











काफी साल पहले किसी काम से कानपुर आया था तब भी इस शहर को लेकर मेरे मन में कोई अच्छी छवि नही बनी थी लेकिन अब भी कानपुर वैसा ही होगा, नही सोचा था। कनपुरिये मुझे माफ़ करें क्योकि हो सकता है कि मेरी कोई बात उन्हें पसंद न आए लेकिन सच ये है कि कानपुर की हालत देख कर सच में दुःख हुआ। आज जब देश के कोने कोने में आतंकवाद के नाम पर गलियों में भी पुलिस वाले आपके झोले की जांच करते दिख जाते है, मुझे इतने बड़े स्टेशन पर एक भी पुलिस वाला नही दिखा। न ही रेलवे का कोई कर्मचारी जिसने मुझसे या किसी और से टिकट मांगा हो। जहां भी निगाह गई गंदगी का ऐसा नजारा जो उबकाई ला दे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रेलवे स्टेशन के बीचोबीच खुला शौचालय हो सकता है। क्या आप सोच सकते हैं कि किसी महानगर के मुख्य स्टेशन की सड़कें महीनों टूटी फूटी रह सकती हैं। रेलवे नियमों के अनुसार गैर पंजीकृत वेंडर कैंपस के अंदर नहीं आ सकते लेकिन यहां तो पूरा बाजार सजता है। सार्वजनिक स्थानों पर ध्रूमपान पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक है लेकिन कानपुर रेलवे स्टेशन परिसर के अंदर की कम से कम दो दर्जन अवैध दुकानें २४ घंटे बीड़ी-सिगरेट उपलध कराती हैं। होटलों के दलाल ट्रेन से उतरने का भी इंतजार नहीं करते। किसी दलाल से निगाह मिली भर नहीं कि आपके बैग पर उसका हाथ होगा, होटल वैष्णव चलिए साहब ....सब मिलेगा।
स्टेशन के बाहर का नजारा तो माशाअल्ला ऐसा कि उसे जेहन से निकालने में भी घंटों लग जाएं। स्टेशन से बाहर निकलने पर आप जैसे ही सीढ़ियों से उतरते हैं तो शहर का पहला नजारा होता है, सार्वजनिक मूत्रालय। टे्रन में घंटों टांगे दबाए लोग यहां भले ही फारिग हो कर चैन की सांस ले रहे हों लेकिन मेरी खिसियाहट उन आला अफसरों के विवेक पर थी जिन्होंने इस मूत्रालय को प्लान करते समय इतना भी नहीं सोचा कि स्टेशन सिर्फ पुरुष नहीं आते। यात्रियों में औरते भी होती हैं। वे बेचारी जिस मजूबरी में वहां से आंख चुरा कर और नाक बंद करके गुजरती हैं, वह सभ्य समाज को शोभा नहीं देता।इसमें दो राय नहीं कि कानपुर के चौपट हो चुके उद्‌योग ने शहर की अलमस्ती छीन ली है। यहां-वहां बंद फैट्रियां, ढहे मकान, जंग लगे उनके दरवाजे यूं भी शहर में एक नकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं लेकिन क्या जीने का सलीका भी हमें दूसरों से उधार लेना पड़ेगा। जिस शहर में सिमरन बनाने वाले वैज्ञानिक हों, जहां देश के शीर्ष रोबोटिक्स शोध चल रहे हों उसी शहर में अब भी भवन निर्माण के दौरान सामग्री ढोने के लिए खच्चरों का इस्तेमाल होता हैं। शहर में ही खच्चरों की संチया तीन हजार से अधिक है। स्टेशन से विजय नगर जाते समय सड़क के किनारे फैले खच्चरों के तबेले बताते हैं कि जिम्मेदार लोगो ने कभी ने इस नजरिए से देखने की जरूरत ही नहीं समझी की शहर का एक चेहरा दिखाने का भी होता है जो कम से कम बाहरियों का दिल तो खट्‌टा करे लेकिन यहां तो सब कुछ उल्टा है। शहर की शान घंटा घर पर कूड़े का ढेर, बीच बाजार फलों के जूस के नाम पर चीनी का शर्बत और रेस्टोरेंट के नाम पर कीचट मेजों पर परोसी गई पूड़ी-सजी। अलसुबह कानपुर स्टेशन के आसपास कुछ घंटे घूम कर इस शहर को जितना जान पाया सिर्फ उतना ही लिखा है। रेव मोती और रेव जैसे मॉल शहर के चेहरे की खूबसूरती तो बढ़ा सकते हैं लेकिन पहले चेहरा मेकअप लायक तो बने।
दुख इस बात का भी हुआ कि सालों से सक्रिय राजनीति और सत्ता में भागीदार रहे श्री प्रकाश जायसवाल इस शहर का नेतृत्व करते हैं, उसके बाद भी कानपुर की स्थिति अनाथों जैसी है। सच है कि हर शहर चंडीगढ़ दिल्ली नहीं हो सकता लेकिन शहर, शहर लगे इसकी जुगत तो करनी ही होगी ताकि जब कोई दूसरे शहर वाला यहां से लौटे तो कम से कम ये न लिखे-- कानपुरिए माफ करें।
नोट--अपनी बात कहने के लिए कुछ तस्वीरें भी डाल रहा हूं। सस्ता मोबाइल है इसलिए अच्छा-बुरा आप समझना। एक बात और ,कानपुर की चाय बहुत शानदार है । कभी मौका लगे तो जरूर पीजिएगा ।

Thursday, 19 November 2009

दरवाजा खुला हो या बंद


दोपहर तीन बजे का वक्त होगा। किसी काम से एक परिचित के घर दाखिल हुआ ही था कि मियां-बीवी का जोरदार झगड़ा सुनाई देने लगा। यहां पति को शक है कि पत्नी को कम सुनता है और पत्नी को लगता है कि जब तक ऊंची आवाज में बात ना करे पति पर असर नहीं होता। इसी चक्कर में दोनों का वॉल्यूम हाई रहता है।आज झगड़े की वजह छोटी थी या बड़ी, इस बारे में सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। घटना कुछ इस तरह है। इस घर के इकलौते कमरे की कुंडी ठीक से बंद नहीं होती। पत्नी जी कपड़े बदल रही थीं कि दोपहर भोज के लिए पधारे पति सीधे कमरे में प्रवेश कर गए। इससे पहले पूछा भी कि क्या कर रही हो? जवाब मिला-'जरा रुको, कपड़े बदल रही हूं।' पति को इस आदेश की पालना करना सही नहीं लगा और पति होने का हक जमाते हुए अंदर घुसते ही ऑर्डर दे डाला-'जल्दी करो, बहुत भूख लगी है। खाना गर्म करो।'पति की इस हरकत से पत्नी तिलमिला गई और युद्ध शुरू हो गया। दोनों में से सही कौन...इसके निर्णय के लिए जज बना डाला मुझे और घटना का ब्यौरा दोनों ने अपने-अपने तरीके से देने लगे। पत्नी की नजर में ये गलत था तो पति का कहना था कि पति से कैसा परदा...इसमे मै क्या बोलूं...' यह कहकर वहां से निकल लिया1 सभी की अपनी राय हो सकती हैं1 मुझे यहां पत्नी की बात ज्यादा सही लगी। कुछ लाइनें भी याद आ गईं, जो शायद निदा फाजली साहब की हैं...

अगर तुम समझते हो

बीवी घर की इज्जत होती है

तो खुदा के लिए उस इज्जत की खातिर

दरवाजा खुला हो या बंद

हमेशा दस्तक देकर ही घर में दाखिल हुवा करो

Friday, 25 September 2009

----या देवी सर्वभूतेषु


नवरात्रि त्योहार है उस मातृ-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का जिसने प्रकृति के नृत्य में सक्रिय भाग लिया। प्रकृति ने स्त्री को अपने महारास में शामिल किया। उसे इस सृष्टि का विधायक दर्जा दिया। उसे सृजन में शामिल किया। नवरात्रि इस चेतन प्रकृति माँ के प्रति कृतज्ञता है।
ऐसा नहीं कि स्त्री सिर्फ माँ है। उसके कितने रूप हैं उन्हें ही व्यक्त करने को सृष्टि ने नवरात्रि पर्व को जन्म दिया। नौ के अंक को पूर्णांक माना गया है। इसमें सब समाया है। सारी सृष्टि समाई है। यह व्यक्त करता है कि नारी साधारण नहीं है। यह नौ रूपों में समाए इसके प्रतिनिधि रूप हैं। यह महागौरी है, तो महाकाली भी बन सकती है। यह स्कंदमाता और शैलपुत्री तो है ही, पर कात्यायनी और कालरात्रि भी है। इस देश ने लाखों सालों से सिर्फ जीवन को समझने में स्वयं को अर्पित कर दिया। नवरात्रि का पर्व तथा उल्लास उस समझ के प्रतिनिधि हैं जो ऋषियों की परंपरा के रूप में इसे हासिल हुई। इनमें गहरे आध्यात्मिक अर्थ छुपे हुए हैं। ये सूत्र इस मानव जीवन के लिए उतने ही कीमती हैं जितने विज्ञान के लिए न्यूटन और आईंस्टीन के सूत्र।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
आप सभी को नवरात्री की शुभकामनाएँ।

Friday, 18 September 2009

कैमरे के आगे


पत्रकारिता में अब धीरे धीरे काफी समय हो चुका है। इस दौरान कई अच्छे -ख़राब अनुभव मिले। कुछ ने मन खट्टा किया तो कुछ ने इस प्रोफेशन को लेकर मेरे उत्साह को और बढाया, शायद यही कारण है कि कभी दिल से इस प्रोफेशन से दूर जाने की नही सोच सका। तमाम दुश्वारियो के बाद भी। रिपोर्टिंग करते समय शायद हर पत्रकार साथी के जीवन में ऐसे पल आते होंगे जिसके रोमांच को वे कभी नही भूल पाए होंगे। ऐसे कुछ अनुभव मैंने भी जिए है। चाहे वह विश्व सुन्दरी सुष्मिता सेन से मुलाकात हो या फ़िर साथी नरेन्द्र यादव के साथ पीएसी की फायरिंग के बीच रिपोर्टिंग, करेली का कर्फू हो या राजू पाल की हत्या के बाद प्रीतम नगर और नीवा की जलती गलियां। एक रिपोर्टर के तौर कभी खुद को पीछे नही होने दिया। कई ऐसे मौके आए जब लगा कि अब मै ख़ुद ही खबर बनने वाला हूँ। सच कहूं तो भीतर से डर भी लगा पर शुक्र है कि अब तक साबूत भी हूँ और उसी उत्साह से रिपोर्टिग भी कर रहा हूँ। काफी दिनों बाद पिछले दिनों allahabad यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के आन्दोलन के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ। इसकी चर्चा भी सिर्फ़ इसलिए कि संयोग से जिस समय मैं , साथी अक्षय, विनोद और एल.ई.यू के ब्रिजेश कैम्पस में चारो ओर से हो रहे पथराव में फंसे थे, समय पूरी हिम्मत के साथ तस्वीरें खीच रहे साथी शिव त्रिपाठी के कैमरे ने अनजाने में हमे भी कैद कर लिया। हम तीन तरफ़ से पथराव और सामने पुलिस के निशाने पर थे । अच्छा हुआ कि पुलिस ने सख्ती न करके ख़ुद भी स्टूडेंट्स पर पथराव शुरू कर दिया। इस बीच हमे भी पत्थरों से बचने का मौका मिल गया । शिव ने कल ही यह तस्वीर दिखायी तो दिल किया कि यह रोमांच आप से भी साझा करू। आम तौर पर कैमरे के पीछे रहने वाले साथियों को आप भी देखिये कैमरे के आगे।

Friday, 4 September 2009

अरे दीवानों इसे पहचानो

सिविल लाइन से गुजरते वक़्त पत्थर गिरजा घर को आपने कई बार देखा होगा लेकिन आज उसकी खूबसूरती किसी नई नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। यह खूबसूरत नजारा ख़ास आपके लिए ताकि आप भी इसे देख और इसका आनंद ले सकें । संजय बनौधा जी की एक और प्यारी सी तस्वीर।

पेट के खातिर

मुझे allahabad में बिताया अपना bachpan याद है। ऐसे najare पुलिस लाइन में akksar dikhte थे। भाई sanjai banudha की इस shandar taswee में shayd apko भी जीवन की jijivisha का नया चेहरा दिखायी दे।

Wednesday, 2 September 2009

गणपति बप्पा मोरया

आज एक वेबसाइट पर गणपति की शानदार तस्वीर देख कर एक पुरानी घटना याद आ गयी। एक रचनाकार मित्र ने अपनी एक कालजयी रचना में चूकवश गणपति बप्पा मोरया के स्थान पर गणपति बप्पा मौर्य लिख दिया। इसे लेकर काफी दिनों तक साथी देवों की जातियां तय करते रहे। मसलन राम सिंह, शंकर पांडे, ब्रम्हा दुबे, रावण तिवारी और न जाने क्या क्या। यह बात पुरानी हो चुकी है लेकिन अब भी जब गणपति बप्पा मोरया सुनता या पढता हूँ तो गणपति की जाति याद करके होठों पर मुस्कान जरू आ जाती है। उम्मीद करता हूँ आप भी बिना किसी पूर्वाग्रह के सिर्फ़ मुस्कुराएंगे।

चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है...

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद में मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को पूरा का पूरा रखूं, जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। सो, मित्र की बातों पर अमल करते हुए कवि व गीतकार नीरज की रचना मैं यहां ऱखता हूं। इस आशा के साथ कि मेरे मित्र की बातें सही साबित हों और भविष्य संवारने की दिशा में जुटे लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाये। यह कविता (और शायद भावनाएं भी ) साथी कौशल किशोर शुक्ला के ब्लॉग से मार ली। इस उम्मीद के साथ की वह मेरी भावनाओं को समझेंगे।


छिप-छिप अश्रु बहाने वालो
मोती व्यर्थ लुटाने वालो
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो
डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।


माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रुठे दिवस मनाने वालो
फटी कमीज सिलाने वालो
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।


खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालो
चाल बदलकर जाने वालो
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है।

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।