Monday 13 June 2011

चीनी कम



वक्त कहां गुजर जाता है पता ही नहीं चलता। कभी लगता है दबोच लूं अपना सारा कल, अपने दोस्त, अपनी जिंदगी, मुट्ठी में। कुछ भी न छूटे। उनकी हाजिरी की गरमी महसूस कर सकूं अपनी हथेलियों के बीच लेकिन ऐसा नहीं हो पाता। रेलगाड़ी के डिब्बे में बैठा देखता हूं अपनों को बिछड़ते। आदमकद से धीरे-धीरे छोटा होते और फिर दूर स्मृत‌ियों में खोते। मेरठ में सब कुछ अच्छा है, ताजा है, काम की गर्मजोशी भी है पर कुछ कमी है जो अखरती है। शायद थोड़ी चीनी कम, शायद थोड़ा नमक कम।









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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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