Friday, 25 September, 2009

----या देवी सर्वभूतेषु


नवरात्रि त्योहार है उस मातृ-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का जिसने प्रकृति के नृत्य में सक्रिय भाग लिया। प्रकृति ने स्त्री को अपने महारास में शामिल किया। उसे इस सृष्टि का विधायक दर्जा दिया। उसे सृजन में शामिल किया। नवरात्रि इस चेतन प्रकृति माँ के प्रति कृतज्ञता है।
ऐसा नहीं कि स्त्री सिर्फ माँ है। उसके कितने रूप हैं उन्हें ही व्यक्त करने को सृष्टि ने नवरात्रि पर्व को जन्म दिया। नौ के अंक को पूर्णांक माना गया है। इसमें सब समाया है। सारी सृष्टि समाई है। यह व्यक्त करता है कि नारी साधारण नहीं है। यह नौ रूपों में समाए इसके प्रतिनिधि रूप हैं। यह महागौरी है, तो महाकाली भी बन सकती है। यह स्कंदमाता और शैलपुत्री तो है ही, पर कात्यायनी और कालरात्रि भी है। इस देश ने लाखों सालों से सिर्फ जीवन को समझने में स्वयं को अर्पित कर दिया। नवरात्रि का पर्व तथा उल्लास उस समझ के प्रतिनिधि हैं जो ऋषियों की परंपरा के रूप में इसे हासिल हुई। इनमें गहरे आध्यात्मिक अर्थ छुपे हुए हैं। ये सूत्र इस मानव जीवन के लिए उतने ही कीमती हैं जितने विज्ञान के लिए न्यूटन और आईंस्टीन के सूत्र।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
आप सभी को नवरात्री की शुभकामनाएँ।

Friday, 18 September, 2009

कैमरे के आगे


पत्रकारिता में अब धीरे धीरे काफी समय हो चुका है। इस दौरान कई अच्छे -ख़राब अनुभव मिले। कुछ ने मन खट्टा किया तो कुछ ने इस प्रोफेशन को लेकर मेरे उत्साह को और बढाया, शायद यही कारण है कि कभी दिल से इस प्रोफेशन से दूर जाने की नही सोच सका। तमाम दुश्वारियो के बाद भी। रिपोर्टिंग करते समय शायद हर पत्रकार साथी के जीवन में ऐसे पल आते होंगे जिसके रोमांच को वे कभी नही भूल पाए होंगे। ऐसे कुछ अनुभव मैंने भी जिए है। चाहे वह विश्व सुन्दरी सुष्मिता सेन से मुलाकात हो या फ़िर साथी नरेन्द्र यादव के साथ पीएसी की फायरिंग के बीच रिपोर्टिंग, करेली का कर्फू हो या राजू पाल की हत्या के बाद प्रीतम नगर और नीवा की जलती गलियां। एक रिपोर्टर के तौर कभी खुद को पीछे नही होने दिया। कई ऐसे मौके आए जब लगा कि अब मै ख़ुद ही खबर बनने वाला हूँ। सच कहूं तो भीतर से डर भी लगा पर शुक्र है कि अब तक साबूत भी हूँ और उसी उत्साह से रिपोर्टिग भी कर रहा हूँ। काफी दिनों बाद पिछले दिनों allahabad यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के आन्दोलन के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ। इसकी चर्चा भी सिर्फ़ इसलिए कि संयोग से जिस समय मैं , साथी अक्षय, विनोद और एल.ई.यू के ब्रिजेश कैम्पस में चारो ओर से हो रहे पथराव में फंसे थे, समय पूरी हिम्मत के साथ तस्वीरें खीच रहे साथी शिव त्रिपाठी के कैमरे ने अनजाने में हमे भी कैद कर लिया। हम तीन तरफ़ से पथराव और सामने पुलिस के निशाने पर थे । अच्छा हुआ कि पुलिस ने सख्ती न करके ख़ुद भी स्टूडेंट्स पर पथराव शुरू कर दिया। इस बीच हमे भी पत्थरों से बचने का मौका मिल गया । शिव ने कल ही यह तस्वीर दिखायी तो दिल किया कि यह रोमांच आप से भी साझा करू। आम तौर पर कैमरे के पीछे रहने वाले साथियों को आप भी देखिये कैमरे के आगे।

Friday, 4 September, 2009

अरे दीवानों इसे पहचानो

सिविल लाइन से गुजरते वक़्त पत्थर गिरजा घर को आपने कई बार देखा होगा लेकिन आज उसकी खूबसूरती किसी नई नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। यह खूबसूरत नजारा ख़ास आपके लिए ताकि आप भी इसे देख और इसका आनंद ले सकें । संजय बनौधा जी की एक और प्यारी सी तस्वीर।

पेट के खातिर

मुझे allahabad में बिताया अपना bachpan याद है। ऐसे najare पुलिस लाइन में akksar dikhte थे। भाई sanjai banudha की इस shandar taswee में shayd apko भी जीवन की jijivisha का नया चेहरा दिखायी दे।

Wednesday, 2 September, 2009

गणपति बप्पा मोरया

आज एक वेबसाइट पर गणपति की शानदार तस्वीर देख कर एक पुरानी घटना याद आ गयी। एक रचनाकार मित्र ने अपनी एक कालजयी रचना में चूकवश गणपति बप्पा मोरया के स्थान पर गणपति बप्पा मौर्य लिख दिया। इसे लेकर काफी दिनों तक साथी देवों की जातियां तय करते रहे। मसलन राम सिंह, शंकर पांडे, ब्रम्हा दुबे, रावण तिवारी और न जाने क्या क्या। यह बात पुरानी हो चुकी है लेकिन अब भी जब गणपति बप्पा मोरया सुनता या पढता हूँ तो गणपति की जाति याद करके होठों पर मुस्कान जरू आ जाती है। उम्मीद करता हूँ आप भी बिना किसी पूर्वाग्रह के सिर्फ़ मुस्कुराएंगे।

चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है...

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद में मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को पूरा का पूरा रखूं, जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। सो, मित्र की बातों पर अमल करते हुए कवि व गीतकार नीरज की रचना मैं यहां ऱखता हूं। इस आशा के साथ कि मेरे मित्र की बातें सही साबित हों और भविष्य संवारने की दिशा में जुटे लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाये। यह कविता (और शायद भावनाएं भी ) साथी कौशल किशोर शुक्ला के ब्लॉग से मार ली। इस उम्मीद के साथ की वह मेरी भावनाओं को समझेंगे।


छिप-छिप अश्रु बहाने वालो
मोती व्यर्थ लुटाने वालो
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो
डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।


माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रुठे दिवस मनाने वालो
फटी कमीज सिलाने वालो
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।


खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालो
चाल बदलकर जाने वालो
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है।

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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