Sunday 27 December 2009

हेलो मुंबई...


आज मुंबई में दूसरी सुबह है। हम अभी तय कर रहे हैं कि एस्सेल वल्डॆ चलें या मुरुड. मैं मुरुड जाना चाहता था क्योंकि यह वही रास्ता था जिस रास्ते कासिद से होकर २६ नवंबर के कातिल मुंबई आए थे। मैं भी इस कमजोर कड़ी को देखना चाहता था। हालांकि अंत में यही तय हुआ कि एस्सेल वल्डॆ ही चलें क्योंकि बेटू उसे लेकर काफी रोमांचित हैं। ये पोस्ट सिफॆ आपको अपडेट करने के लिए डाल रहा हूं। डिटेल पोस्ट इलाहाबाद लौट कर करूंगा। सोचा तो है कि मुंबई पर पूरी सिरीज पोस्ट करूं। कर पाया तो मुझे भी मजा आएगा। वैसे कल हम मुंबई साउथ की लगभग सभी शानदार जगहों को आंखों के जरिए दिल में बसा चुके हैं। शाहरुख का घर मन्नत, उसके सामने स्थित शानदार बैंड स्टैंड, चौपाटी, एलिफेंटा, फैशन स्टीट, हाजी अली, मैरीन डाइव, सी लिंक, सुखराम फूड प्लाजा जैसे कई और नाम हैं जिन्हें डिटेल पोस्ट में शेयर करूंगा। तब तक मुंबई का एक और शानदार नजारा आपके लिए।

गुड नाइट मुंबई...


माफ कीजिएगा, इलाहाबाद से निकला तो सोचा था कि मोबाइल के जरिए आप से संपकॆ बनाए रखूंगा लेकिन उसकी नौबत ही नहीं आई। २४ दिसंबर को इलाहाबाद से सिरडी के लिए रवाना हुआ तो कुछ किलोमीटर के बाद ही खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ में रहने वाली एयरटेल और वोडाफोन कंपनियों के नेटवकॆ्स ने साथ छोड़ दिया।भला हो अंबानी बंधुओं का कि फैमिली में तमाम ब्रेक्स के बाद भी रिलायंस का नेटवकॆ बिना ब्रेक्स के रहा। आज पूरे दिन साथॆक घुमक्कड़ी के बाद मुंबई को नए नजरिए से देखने का मौका मिला। रात के करीब १२ बजे हम वापस घर पहुंचे। थकी हुई मलिल्काए आला और साहबजादे कुछ ही मिनटों में सो गए। मुंबई अपनी गति से चल रही है। मैं भी काफी थक चुका हूं लेकिन आशू का लैपटाप देखकर दिल हुआ कि मुंबई को कम से कम गुड नाइट जरूर कर लूं। इलाहाबाद लौटते ही कुछ नए अनुभव सिरडी और मुंबई को लेकर आपके सामने हाजिर होउंगा। तब तक के लिए गुड नाइट मुंबई...................

Wednesday 23 December 2009

डॉ.अजय ke 'चेहरे'




kuch बेहद शांत, kuch डरे-सहमे, kuch निश्चल तो kuch गुस्से से तमतमाए हुए। यहां चेहरे ही चेहरे हैं। जिंदगी kuch जाने कितने रंग अपनी safed -काली लाइनों में समेटे ये चेहरे हमारे आस-पास ke ही हैं। उसी भीड़ का हिस्सा जिसमें हम-आप भी एक शिनाkhaत भर हैं। एक चित्रकार ke तौर पर डॉ. अजय जैतली ने इन चेहरों को पढऩे से बड़ा जो काम किया है वह है इन चेहरों ke पीछे छिपे चेहरों की तलाश यानी 'बियांड faces । इलाहाबाद विश्वविद्‌यालय ke दृश्य कला विभाग ke अध्यक्ष और चित्रकार डॉ. अजय जैतली की तीन दिवसीय प्रदर्शनी 'बियांड पᆬेसेस' मंगलवार से निराला सभागार में शुरू हुई। इसे देखने वᆬुछ नामचीन, kuch विषय विशेषज्ञ तो वᆬुछ कला जिज्ञासु भी पहुंचे। चित्रों को देखकर उनका अपना अंतस भले ही अलग-अलग ढंग से भीगा हो लेकिन कला की एक ताजी बयार शायद सभी को छू कर निकल गई। चारकोल और पेस्टल कलर की आड़ी-तिरछी लाइनों वᆬे बीच से झांकते लाल, नीले, हरे और गहरे बैंगनी 'चेहरे' शायद किसी और ही लोक की रचना करते दिखते हैं जबकि ये चेहरे हैं हमारे आस-पास ke ही। डॉ. अजय की पहचान की शायद वजह भी यही है कि आम सजेタट को भी बेहद खास अंदाज में पेंट करते हैं। पूरी तरह से अलहदा। उद्‌घाटन ke बाद साहित्यकार-पत्रकार प्रदीप सौरभ भी डॉ. अजय वᆬे चित्रों पर वᆬुछ ऐसी ही टिप्पणी करते हैं,' अजय ने इन चित्रों ke लिए पेस्टल और कोयले का इस्तेमाल किया है। इसमें टूल्स, ब्रश नहीं बल्कि उंगलियां बनती हैं-यानी सब kuch डायरेタट दिल से।' खुद डॉ.अजय भी अपने चेहरों ke बारे में बताते हैं 'मैं हर चेहरे की जिंदगी की लड़ाई में शामिल हुआ।

Wednesday 2 December 2009

इसरार भाई उर्फ़ 24x7


इलाहाबाद में नवाब युसूफ रोड पर एक शॉप है, सरस्वती आटो सर्विस । कल दोपहर में समय मिला तो सोचा गाड़ी साफ करा लूँ। शॉप पर भीड़ काफी थी। मुझे लगा कम समय में मेरा काम नही हो पायेगा लेकिन तभी एक आवाज ने मेरा ध्यान खीचा ......ऐ बब्लू जा साहब की गाड़ी साफ कर पहले। ठीक से धोना। पोलिश भी लगा देना। मुझे थोड़ी राहत हुई ... चलो अब समय से गाड़ी साफ हो जाएगी। कुछ मिनट में ही बातचीत से पता चल गया कि मुझ पर अतिरिक्त मेहरबानी करने वाले सज्जन दरअसल इसरार भाई है। वही इस सर्विस सेण्टर के मालिक भी है। मुझ से नही रहा गया तो मैंने पूछ ही लिया...क्यो इसरार भाई ये सरस्वती सर्विस सेंटर का क्या चक्कर है....इसरार के लिए मेरा सवाल चौकाने वाला नही था, मुझ से पहले भी ये सवाल उनसे कई लोग पूछ चुके होंगे। इसरार बोले भाई साहब मेरे लोग भी नाराज़ होते है कि सरस्वती के नाम दुकान क्यो चला हो। मै सबसे यही कहता हूँ कि सरस्वती माने ज्ञान और ज्ञान माने विद्या। मै नही मानता भेद-भाव। देखिये, सबका मालिक एक है। दिन भर काम करता हूँ तो शाम को दाल-रोटी का इंतजाम हो पाता है। रोटी अल्ला कि मेहरबानी से आ रही है या सरस्वती की कृपा से इससे क्या फर्क पड़ता है। मै तो आप सबकी सेवा में 24x7 लगा हुआ हूँ। ऊपर वाला भी सेवा में मेवा की सीख देता है........... इसरार भाई जाने कब तक और न जाने क्या क्या बोलते रहे लेकिन मेरे जेहन में उनकी बात अब भी गूंज रही है.... मै नही मानता भेद-भाव। देखिये, सबका मालिक एक है। दिन भर काम करता हूँ तो शाम को दाल-रोटी का इंतजाम हो पाता है। रोटी अल्ला कि मेहरबानी से आ रही है या सरस्वती की कृपा से इससे क्या फर्क पड़ता है...............................

Tuesday 1 December 2009

हेलमेट पहनें, सुरछित रहें




शहर की बदनाम गली का नाम है मीरगंज। आम तौर पर इस मोहल्ले का नाम लोग दबी जुबान में ही लेते है। कुछ शरीफ लोग बहाने से भी इस मोहल्ले में झाँकने की कोशिश करते है लेकिन हमारे छायाकार साथियों के लिए इस इलाके में जाने का मौका कारू के खजाने से कम नही है। चाहे वह कोल्कता का सोनागाछी हो या फ़िर मुम्बई की फाकलैंड रोड। यहाँ की तस्वीरें छाप पाने वाला किस्मत वाला छायाकार माना जाता है। सिल्वर स्क्रीन के सच से बिल्कुल अलग। न पारो की तरह और न ही उमराव जान की तरह। यहाँ न महल से दिखने वाले कोठे है और न ही पान चबाती बाई। यहाँ तो हर किसी को दो जून की रोटी के लिए भी जाने कितने बार अपने गर्म शरीर पर वासना की रोटियां सिकवानी पड़ती है। जानवरों के दरबे जैसी जगह पर उम्र बितानी पड़ती है। आज विश्व एड्स दिवस पर एक संस्था के प्रतिनिधि का फ़ोन आया कि वह मीरगंज में हेलमेट बाँटना चाहते है। साथी अनुराग चौके कि मीरगंज में भला हेलमेट का क्या काम।खैर कुरेदा तो पता चला कि वह दरअसल कंडोम को हेलमेट कह रहे है। उन्हें कंडोम कहने में शर्म आ रही थी इसलिए वो कोड में बोल रहे थे। ये मौका भला कोई क्यो छोड़ना चाहेगा इसलिए इस शोर्ट नोटिस पर ही संस्था के तीन प्रतिनिधियों को कवर करने के लिए दो दर्जन छायाकार मीरगंज पहुँच गए। संस्था के लोगो ने कंडोम काम पैक निकाल लिया। उन्हें संकोच भी हो रहा था। एक ने धीरे से एक मीरगंज वाली को बताने कि कोशिश की कि कंडोम कैसे लगाया जाता है। फ़िर क्या था बात उसके दिल को लग गयी। बोली .... तुम क्या बताओगे बाबु , जाओ अपना काम करो हमें पता है, कैसे लगाया जाता है। चले आए फोटो खिचवाने ... हमारी भी कुछ इज्ज़त है... कमरे में तो रोज़ नंगे होते है अब सड़क पर भी नंगा करोगे क्या...........ढेर सारी औपचारिकता कुछ मिनटों में ख़त्म हो गया। कैमरे बैग में चले गए। कुछ चटपटी तस्वीरें फ़िर नही मिल सकी । मीरगंज फ़िर आबाद हो गया बिना हेलमेट के।

Monday 30 November 2009

संगम पर तुम्हारा स्वागत है परिंदों

साथी शिव त्रिपाठी ने दो दिन पहले जब जब यह तस्वीर ली थी तो उन्हें परिंदों के साथ खेलता यह बच्चा सिर्फ़ रंगीन विषय भर लगा था। आज जब इसे ब्लॉग पर डाल रहा था तो मुझे इन सफ़ेद परिंदों के बीच यह बच्चा भी परिंदा ही लगा। उड़ान की बेलौस कोशिश करता। काश मै भी एक होता इन परिंदों में। उड़ सकता जी भर खुले आकाश में।

Saturday 21 November 2009

कनपुरिये माफ़ करें











काफी साल पहले किसी काम से कानपुर आया था तब भी इस शहर को लेकर मेरे मन में कोई अच्छी छवि नही बनी थी लेकिन अब भी कानपुर वैसा ही होगा, नही सोचा था। कनपुरिये मुझे माफ़ करें क्योकि हो सकता है कि मेरी कोई बात उन्हें पसंद न आए लेकिन सच ये है कि कानपुर की हालत देख कर सच में दुःख हुआ। आज जब देश के कोने कोने में आतंकवाद के नाम पर गलियों में भी पुलिस वाले आपके झोले की जांच करते दिख जाते है, मुझे इतने बड़े स्टेशन पर एक भी पुलिस वाला नही दिखा। न ही रेलवे का कोई कर्मचारी जिसने मुझसे या किसी और से टिकट मांगा हो। जहां भी निगाह गई गंदगी का ऐसा नजारा जो उबकाई ला दे। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि रेलवे स्टेशन के बीचोबीच खुला शौचालय हो सकता है। क्या आप सोच सकते हैं कि किसी महानगर के मुख्य स्टेशन की सड़कें महीनों टूटी फूटी रह सकती हैं। रेलवे नियमों के अनुसार गैर पंजीकृत वेंडर कैंपस के अंदर नहीं आ सकते लेकिन यहां तो पूरा बाजार सजता है। सार्वजनिक स्थानों पर ध्रूमपान पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक है लेकिन कानपुर रेलवे स्टेशन परिसर के अंदर की कम से कम दो दर्जन अवैध दुकानें २४ घंटे बीड़ी-सिगरेट उपलध कराती हैं। होटलों के दलाल ट्रेन से उतरने का भी इंतजार नहीं करते। किसी दलाल से निगाह मिली भर नहीं कि आपके बैग पर उसका हाथ होगा, होटल वैष्णव चलिए साहब ....सब मिलेगा।
स्टेशन के बाहर का नजारा तो माशाअल्ला ऐसा कि उसे जेहन से निकालने में भी घंटों लग जाएं। स्टेशन से बाहर निकलने पर आप जैसे ही सीढ़ियों से उतरते हैं तो शहर का पहला नजारा होता है, सार्वजनिक मूत्रालय। टे्रन में घंटों टांगे दबाए लोग यहां भले ही फारिग हो कर चैन की सांस ले रहे हों लेकिन मेरी खिसियाहट उन आला अफसरों के विवेक पर थी जिन्होंने इस मूत्रालय को प्लान करते समय इतना भी नहीं सोचा कि स्टेशन सिर्फ पुरुष नहीं आते। यात्रियों में औरते भी होती हैं। वे बेचारी जिस मजूबरी में वहां से आंख चुरा कर और नाक बंद करके गुजरती हैं, वह सभ्य समाज को शोभा नहीं देता।इसमें दो राय नहीं कि कानपुर के चौपट हो चुके उद्‌योग ने शहर की अलमस्ती छीन ली है। यहां-वहां बंद फैट्रियां, ढहे मकान, जंग लगे उनके दरवाजे यूं भी शहर में एक नकारात्मक ऊर्जा फैलाते हैं लेकिन क्या जीने का सलीका भी हमें दूसरों से उधार लेना पड़ेगा। जिस शहर में सिमरन बनाने वाले वैज्ञानिक हों, जहां देश के शीर्ष रोबोटिक्स शोध चल रहे हों उसी शहर में अब भी भवन निर्माण के दौरान सामग्री ढोने के लिए खच्चरों का इस्तेमाल होता हैं। शहर में ही खच्चरों की संチया तीन हजार से अधिक है। स्टेशन से विजय नगर जाते समय सड़क के किनारे फैले खच्चरों के तबेले बताते हैं कि जिम्मेदार लोगो ने कभी ने इस नजरिए से देखने की जरूरत ही नहीं समझी की शहर का एक चेहरा दिखाने का भी होता है जो कम से कम बाहरियों का दिल तो खट्‌टा करे लेकिन यहां तो सब कुछ उल्टा है। शहर की शान घंटा घर पर कूड़े का ढेर, बीच बाजार फलों के जूस के नाम पर चीनी का शर्बत और रेस्टोरेंट के नाम पर कीचट मेजों पर परोसी गई पूड़ी-सजी। अलसुबह कानपुर स्टेशन के आसपास कुछ घंटे घूम कर इस शहर को जितना जान पाया सिर्फ उतना ही लिखा है। रेव मोती और रेव जैसे मॉल शहर के चेहरे की खूबसूरती तो बढ़ा सकते हैं लेकिन पहले चेहरा मेकअप लायक तो बने।
दुख इस बात का भी हुआ कि सालों से सक्रिय राजनीति और सत्ता में भागीदार रहे श्री प्रकाश जायसवाल इस शहर का नेतृत्व करते हैं, उसके बाद भी कानपुर की स्थिति अनाथों जैसी है। सच है कि हर शहर चंडीगढ़ दिल्ली नहीं हो सकता लेकिन शहर, शहर लगे इसकी जुगत तो करनी ही होगी ताकि जब कोई दूसरे शहर वाला यहां से लौटे तो कम से कम ये न लिखे-- कानपुरिए माफ करें।
नोट--अपनी बात कहने के लिए कुछ तस्वीरें भी डाल रहा हूं। सस्ता मोबाइल है इसलिए अच्छा-बुरा आप समझना। एक बात और ,कानपुर की चाय बहुत शानदार है । कभी मौका लगे तो जरूर पीजिएगा ।

Thursday 19 November 2009

दरवाजा खुला हो या बंद


दोपहर तीन बजे का वक्त होगा। किसी काम से एक परिचित के घर दाखिल हुआ ही था कि मियां-बीवी का जोरदार झगड़ा सुनाई देने लगा। यहां पति को शक है कि पत्नी को कम सुनता है और पत्नी को लगता है कि जब तक ऊंची आवाज में बात ना करे पति पर असर नहीं होता। इसी चक्कर में दोनों का वॉल्यूम हाई रहता है।आज झगड़े की वजह छोटी थी या बड़ी, इस बारे में सभी की राय अलग-अलग हो सकती है। घटना कुछ इस तरह है। इस घर के इकलौते कमरे की कुंडी ठीक से बंद नहीं होती। पत्नी जी कपड़े बदल रही थीं कि दोपहर भोज के लिए पधारे पति सीधे कमरे में प्रवेश कर गए। इससे पहले पूछा भी कि क्या कर रही हो? जवाब मिला-'जरा रुको, कपड़े बदल रही हूं।' पति को इस आदेश की पालना करना सही नहीं लगा और पति होने का हक जमाते हुए अंदर घुसते ही ऑर्डर दे डाला-'जल्दी करो, बहुत भूख लगी है। खाना गर्म करो।'पति की इस हरकत से पत्नी तिलमिला गई और युद्ध शुरू हो गया। दोनों में से सही कौन...इसके निर्णय के लिए जज बना डाला मुझे और घटना का ब्यौरा दोनों ने अपने-अपने तरीके से देने लगे। पत्नी की नजर में ये गलत था तो पति का कहना था कि पति से कैसा परदा...इसमे मै क्या बोलूं...' यह कहकर वहां से निकल लिया1 सभी की अपनी राय हो सकती हैं1 मुझे यहां पत्नी की बात ज्यादा सही लगी। कुछ लाइनें भी याद आ गईं, जो शायद निदा फाजली साहब की हैं...

अगर तुम समझते हो

बीवी घर की इज्जत होती है

तो खुदा के लिए उस इज्जत की खातिर

दरवाजा खुला हो या बंद

हमेशा दस्तक देकर ही घर में दाखिल हुवा करो

Friday 25 September 2009

----या देवी सर्वभूतेषु


नवरात्रि त्योहार है उस मातृ-शक्ति के प्रति कृतज्ञता का जिसने प्रकृति के नृत्य में सक्रिय भाग लिया। प्रकृति ने स्त्री को अपने महारास में शामिल किया। उसे इस सृष्टि का विधायक दर्जा दिया। उसे सृजन में शामिल किया। नवरात्रि इस चेतन प्रकृति माँ के प्रति कृतज्ञता है।
ऐसा नहीं कि स्त्री सिर्फ माँ है। उसके कितने रूप हैं उन्हें ही व्यक्त करने को सृष्टि ने नवरात्रि पर्व को जन्म दिया। नौ के अंक को पूर्णांक माना गया है। इसमें सब समाया है। सारी सृष्टि समाई है। यह व्यक्त करता है कि नारी साधारण नहीं है। यह नौ रूपों में समाए इसके प्रतिनिधि रूप हैं। यह महागौरी है, तो महाकाली भी बन सकती है। यह स्कंदमाता और शैलपुत्री तो है ही, पर कात्यायनी और कालरात्रि भी है। इस देश ने लाखों सालों से सिर्फ जीवन को समझने में स्वयं को अर्पित कर दिया। नवरात्रि का पर्व तथा उल्लास उस समझ के प्रतिनिधि हैं जो ऋषियों की परंपरा के रूप में इसे हासिल हुई। इनमें गहरे आध्यात्मिक अर्थ छुपे हुए हैं। ये सूत्र इस मानव जीवन के लिए उतने ही कीमती हैं जितने विज्ञान के लिए न्यूटन और आईंस्टीन के सूत्र।
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
आप सभी को नवरात्री की शुभकामनाएँ।

Friday 18 September 2009

कैमरे के आगे


पत्रकारिता में अब धीरे धीरे काफी समय हो चुका है। इस दौरान कई अच्छे -ख़राब अनुभव मिले। कुछ ने मन खट्टा किया तो कुछ ने इस प्रोफेशन को लेकर मेरे उत्साह को और बढाया, शायद यही कारण है कि कभी दिल से इस प्रोफेशन से दूर जाने की नही सोच सका। तमाम दुश्वारियो के बाद भी। रिपोर्टिंग करते समय शायद हर पत्रकार साथी के जीवन में ऐसे पल आते होंगे जिसके रोमांच को वे कभी नही भूल पाए होंगे। ऐसे कुछ अनुभव मैंने भी जिए है। चाहे वह विश्व सुन्दरी सुष्मिता सेन से मुलाकात हो या फ़िर साथी नरेन्द्र यादव के साथ पीएसी की फायरिंग के बीच रिपोर्टिंग, करेली का कर्फू हो या राजू पाल की हत्या के बाद प्रीतम नगर और नीवा की जलती गलियां। एक रिपोर्टर के तौर कभी खुद को पीछे नही होने दिया। कई ऐसे मौके आए जब लगा कि अब मै ख़ुद ही खबर बनने वाला हूँ। सच कहूं तो भीतर से डर भी लगा पर शुक्र है कि अब तक साबूत भी हूँ और उसी उत्साह से रिपोर्टिग भी कर रहा हूँ। काफी दिनों बाद पिछले दिनों allahabad यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के आन्दोलन के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ। इसकी चर्चा भी सिर्फ़ इसलिए कि संयोग से जिस समय मैं , साथी अक्षय, विनोद और एल.ई.यू के ब्रिजेश कैम्पस में चारो ओर से हो रहे पथराव में फंसे थे, समय पूरी हिम्मत के साथ तस्वीरें खीच रहे साथी शिव त्रिपाठी के कैमरे ने अनजाने में हमे भी कैद कर लिया। हम तीन तरफ़ से पथराव और सामने पुलिस के निशाने पर थे । अच्छा हुआ कि पुलिस ने सख्ती न करके ख़ुद भी स्टूडेंट्स पर पथराव शुरू कर दिया। इस बीच हमे भी पत्थरों से बचने का मौका मिल गया । शिव ने कल ही यह तस्वीर दिखायी तो दिल किया कि यह रोमांच आप से भी साझा करू। आम तौर पर कैमरे के पीछे रहने वाले साथियों को आप भी देखिये कैमरे के आगे।

Friday 4 September 2009

अरे दीवानों इसे पहचानो

सिविल लाइन से गुजरते वक़्त पत्थर गिरजा घर को आपने कई बार देखा होगा लेकिन आज उसकी खूबसूरती किसी नई नवेली दुल्हन जैसी लग रही थी। यह खूबसूरत नजारा ख़ास आपके लिए ताकि आप भी इसे देख और इसका आनंद ले सकें । संजय बनौधा जी की एक और प्यारी सी तस्वीर।

पेट के खातिर

मुझे allahabad में बिताया अपना bachpan याद है। ऐसे najare पुलिस लाइन में akksar dikhte थे। भाई sanjai banudha की इस shandar taswee में shayd apko भी जीवन की jijivisha का नया चेहरा दिखायी दे।

Wednesday 2 September 2009

गणपति बप्पा मोरया

आज एक वेबसाइट पर गणपति की शानदार तस्वीर देख कर एक पुरानी घटना याद आ गयी। एक रचनाकार मित्र ने अपनी एक कालजयी रचना में चूकवश गणपति बप्पा मोरया के स्थान पर गणपति बप्पा मौर्य लिख दिया। इसे लेकर काफी दिनों तक साथी देवों की जातियां तय करते रहे। मसलन राम सिंह, शंकर पांडे, ब्रम्हा दुबे, रावण तिवारी और न जाने क्या क्या। यह बात पुरानी हो चुकी है लेकिन अब भी जब गणपति बप्पा मोरया सुनता या पढता हूँ तो गणपति की जाति याद करके होठों पर मुस्कान जरू आ जाती है। उम्मीद करता हूँ आप भी बिना किसी पूर्वाग्रह के सिर्फ़ मुस्कुराएंगे।

चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है...

भविष्य सुधारने के लिए आप क्या हैं? सपने देखते हैं और उसे साकार करने की कोशिशें करते हैं। सपने साकार हुए तो अच्छा और टूट गये तो .....? डर यहीं होता है, घबराहट यहीं होती है। इलाहाबाद में मेरे एक मित्र श्री सतीश श्रीवास्तव ने सुझाया है कि भविष्य संवारने के सिलसिले में मैं अपने ब्लाग पर गोपाल दास नीरज की उस कविता को पूरा का पूरा रखूं, जिसमें उन्होंने फरमाया है कि कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है, चंद खिलौने के खोने से बचपन नहीं मरा करता है। सो, मित्र की बातों पर अमल करते हुए कवि व गीतकार नीरज की रचना मैं यहां ऱखता हूं। इस आशा के साथ कि मेरे मित्र की बातें सही साबित हों और भविष्य संवारने की दिशा में जुटे लोगों में इससे कुछ आशाओं का संचार हो पाये। यह कविता (और शायद भावनाएं भी ) साथी कौशल किशोर शुक्ला के ब्लॉग से मार ली। इस उम्मीद के साथ की वह मेरी भावनाओं को समझेंगे।


छिप-छिप अश्रु बहाने वालो
मोती व्यर्थ लुटाने वालो
कुछ सपनों के मर जाने से
जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालो
डूबे बिना नहाने वालो
कुछ पानी के बह जाने से
सावन नहीं मरा करता है।


माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आंसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रुठे दिवस मनाने वालो
फटी कमीज सिलाने वालो
कुछ दीयों के बुझ जाने से
आंगन नहीं मरा करता है।


खोता कुछ भी नहीं यहां पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालो
चाल बदलकर जाने वालो
चंद खिलौनों के खोने से
बचपन नहीं मरा करता है।

Monday 31 August 2009

फुरसतिया के ब्लॉग से।

जो बीच भंवर इठलाया करते ,
बांधा करते है तट पर नांव नहीं।
संघर्षों के पथ के यायावर ,
सुख का जिनके घर रहा पडाव नहीं।
जो सुमन बीहडों में वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते,
जो दीप उम्र भर जलते हैं
वो दीवाली के मोहताज नहीं होते।

मानसिक हलचल में पढ़ा

कोई वर्तमान नहीं है। केवल भूत है या भविष्य। आप चाहे जितना बारीकी से समय को छीलें, या तो वह हो चुका है, या होगा। तब वे लोग जो दावा करते हैं कि वे वर्तमान में जीते हैं, किसमें रहते हैं? भूतकाल उन्हें संज्ञाशून्य कर देता है यह विश्वास करने में कि वह अब भी चल रहा है। और वे उसे वर्तमान कहते।समय उड़ रहा है। भविष्य तेजी से भूतकाल बन रहा अपने भूतकाल की उपलब्धियों पर विश्राम करना सरल है। यह और भी सरल है कि कोसा जाये भविष्य के अंधकार।

Sunday 30 August 2009

खिड़की

खिड़की बाहर खुलती है वह अंदर को बाहर देखने के जरिये जोड़ती है। बाहर है यह अंदर को याद रहे। बाहर को यह अहसास बना रहे कि अंदर है। खिड़की अंदर और बाहर दोनों को एक दूसरे का एहतराम करने का एक सीधा-साधा अवसर है। आकाश हर घर पर छाया है पर कई बार वह खिड़की से दिख पड़ता है। खिड़की के द्वारा घर आकाश को याद करता है। यह भी कि आकाश खिड़की से होकर घर से अंतरंग बनकर प्रवेश करता है। खिड़की से जो बाहर का दृश्य का दिख पड़ता है वह चुपचाप घर में दाखिल हो जाता है। उसी रास्ते के अंदर जो हो रहा है उसका कुछ हिस्सा फिसल जाता है। कई बार घर के अंदर से हम खिड़की के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ देख पाते हैं जिसे हमने देखा। यह न देखे हुए को पता, न किसी और को। खिड़की एक गोपन दृष्टि हो सकती है। एक आँख जो देखती है और जिसे देखते हुए कोई और नहीं देख पाता। खिड़की रहस्य को छिपाना और भेद का न खोलना जानती है। अगर वह चाहे तो भेद खोल भी सकती है। खिड़की खतरनाक हो सकती है। कविता संसार की अनंत पर खिड़की है। उस निरंतरता को जो है, हम अगर यह खिड़की न होती तो शायद अलक्षित ही जाने देते। हम चाहें तो इस खिड़की से दृश्यावलोकन कर सकते हैं। हम अनंत देख सकते हैं। पर खिड़की का दृश्यता का और अनंत का होना हमारे झांकने पर निर्भर नहीं है। खिड़की झाँकने का न्यौता है। हो सकता है कि हमे न्यौते को स्वीकार करने मे देर हो जाए। पर इस देरी से फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि कविता जिस अनंत पर खिड़की है वह बीतता नहीं है। पर झाँकना करना भी है-जो दूर देखता है वह हिस्सेदार नहीं है, यह धारणा निराधार है। झाँकते हुए हम दृश्य मे शामिल हो जाते हैं। कविता भवसागर पार करने की नौका नहीं है पर वह भवसागर की मंझधार में अनंत पा लेने का दुस्साहस जरूर है। वह जो पार और सुदूर है उसे सामने और पास लाना है-कम से कम उसकी अथक चेष्टा है।

खुराक

चमन (रमन से)- देखो पेपर में न्यूज आई है कि साइंटिस्ट लोग पता लगा रहे है कि कोई आदमी बिना दिमाग के कितने दिन जिंदा रह सकता है।
रमन (चमन से)- इसका जवाब तो बड़ा आसान है, तू बस उन्हें अपनी उम्र बता दें।

अनदेखी का शिकार पुरामहत्व स्मारक

विश्व विख्यात स्वर्ण नगरी जैसलमेर के विभिन्न भागों में प्राचीन एवं ऐतिहासिक धरोहरों का भंडार है, लेकिन अतीत की कहानी सुनाने वाली इन इमारतों की लगातार अनदेखी को रोका नहीं गया तो पुरामहत्व की अनमोल धरोहर के लिए खतरा खड़ा हो सकता है।
स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों किलों, हवेलियों और छतरियों से अटे जैसलमेर में स्थित विश्व विख्यात सोनार किले के संरक्षण को लेकर कोई विशेष प्रयास नहीं हुए है। यह सिर्फ जैसलमेर के सोनार किले की कहानी नहीं है, बल्कि जिले में कई दुर्ग भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे है। जैसलमेर में सैकड़ों शानदार प्राचीन व ऐतिहासिक स्मारक हैं और इसी विरासत के बलबूते पर विश्व के पर्यटन मानचित्र पर यह स्वर्ण नगरी उभरी है, लेकिन इन स्मारकों के संरक्षण व रखरखाव के लिए प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की पहल दिखाई नहीं दे रही है।
जैसलमेर के इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा का कहना है कि जैसलमेर विश्व धरोहर के क्षेत्र में अपनी एक अहम पहचान रखता है, लेकिन यहां की सांस्कृतिक धरोहर को विरासत के रूप में सहेज कर रखने के कोई महत्वपूर्ण प्रयास नहीं किए गए हैं। राज्य सरकार व केंद्र सरकार द्वारा प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए बना गए विभाग नाम मात्र के है।
जैसलमेर में सात हवेलियों का समूह है। सरकार ने वर्ष 1976 में तीन पूर्ण एवं एक हवेली का 42 प्रतिशत भाग अधिग्रहित किया था, लेकिन आज तक इनके संरक्षण के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। 'लिपिंग फोर्ट' के रूप में विश्व विख्यात जैसलमेर के 'सोनार किले' के संरक्षण के लिए योजनाएं बनीं, लेकिन उन पर सही रूप से अमल नहीं किया गया।
नगर पालिका व पुरातत्व विभाग में तालमेल नहीं होने से दुर्ग से पानी की निकासी की अव्यवस्था कोढ में खाज का काम कर रही है। कुछ समय पहले पुरामहत्व के स्मारकों को संवारने का काम करने वाले एक संगठन के माध्यम से तथा नगरपालिका और पुरातत्व विभाग ने सोनार किले पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित दुर्ग जर्जर हो रहे हैं। जैसलमेर जिले के मानगढ, नाचना, हड्डा किशनगढ, काणोद, लखा आदि गांवों में कई दुर्ग हैं। जैसलमेर पर्यटन व्यवसाय महासंघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ का मानना है कि सरकार एवं विरासत प्रेमी संस्थाओं द्वारा प्राचीन धरोहरों के लिए जो कुछ भी किया जा रहा है उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है। पर्यटकों का मानना है कि प्राचीन धरोहरों व स्मारकों की अनदेखी से यहां के पर्यटन को खतरा है।
अगर ऐतिहासिक विरासत को सहेजने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब इन विरासतों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में जैसलमेर के ही नहीं बल्कि भारत के पर्यटन को बहुत बड़ा झटका लग सकता है।

Friday 7 August 2009

हाईकू

व्यस्तताओं में पूरा दिन रेत सा जाने कब बीत गया कि पालथी मार कर आपके साथ बैठने का वक्त ही नहीं मिला। फिर भी एक हाईकू आपके लिए----

मैं चूम लेता हूं
पवनदूती के अधरों को अक्सर
मुझे पता है,
तुम भी चूमती हो....

Thursday 6 August 2009

नए नजरिए से पाकिस्तान

बुधवार को जल्दी घर पहुंचने के वायदे के बाद भी काफी देर हो गई। घर पहुंचते-पहुंचते घड़ी की सूइयां १२ का साथ छोड़ चुकी थीं सो बीवी से सिफॆ गुडनाइट ही हो सकी। मतलब यह कि देर से आने के कारण पड़ने वाली डांट से बच गया।खाने के बाद रोज की शगल में रिमोट के बटन के साथ छेड़छाड़ के बीच एक कायॆक्रम पर आंखे रुक गईं। नैटजियो की फेमस सिरीज डोंट टेल माई मदर में इस बार पाकिस्तान की बारी थी। पाकिस्तान के बारे में जब भी, जितना भी पढ़ो मन नहीं भरता। हमेशा और जानने की इच्छा होती है, (पट्टिदार जो ठहरा) , सो आंखें टीवी से चिपक गई। एक घंटा जाने कब बीत गया पता ही नहीं चला। इस दौरान पाकिस्तान को बिल्कुल नए नजरिए से देखने को मिला। ऐसे फैक्ट जो सालों से सूचनाओं के बाजार में रहने के बाद भी मेरी जानकारी में नहीं थे।
तथ्य एक-
करांची में हैदर भाई की वकॆशॉप हैं। यूं तो यह एक लेदर फैक्ट्री है, जहां हर रोज करीब सवा सौ महिलाएं (इनमें १२ सौ १४ वषॆ की लड़िकयां भी शामिल हैं) में चमड़े के सामान बनती हैं। कुछ नकाब, स्कटॆ नुमा ड्रेस, कोड़े या ऐसी ही कुछ और चीजें। दरअसल यह वकॆशॉप अमेरिका, मलयेशिया, थाईलैंड, चीन जैसे देशों के अधिकृत या अनाधिकृत सेक्स स्टोसॆ के लिए सेक्स ट्वॉय बनाती हैं। धमॆ को लेकर बेहद कट्टर छवि वाले पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कारोबार की कल्पना भी अजीब लगती हैं। हैदर बताते हैं कि वर्कशॉप में काम करने वाली किसी भी महिला को यह नहीं पता कि वह जो चीजें बना रहीं हैं, उसका इस्तेमाल क्या है। यह काम उनके लिए सिफॆ काम है। उनका मानना है कि कोई भी धमॆ कोई काम करने से नहीं रोक सकता।
तथ्य दो-
पिछले दिनों भारत के एक लोकप्रिय टीवी चैनल ने बेगम कायॆक्रम प्रस्तुत किया। इसमें जॉन इब्राहिम से लेकर अभिषेक बच्चन तक साक्षात्कार को पहुंचे। काफी हॉट और ब्यूटीफुल मानी गई इस कायॆक्रम की होस्ट बेगम को लेकर अस्सी फीसदी लोग अब भी अनजान हैं। कुछ उन्हें एक सेक्सी ओल्ड एज महिला के तौर पर जानते हैं तो कुछ औरत के वेष में पुरुष। लेकिन इस कायॆक्रम को होस्ट करने वाली बेगम दरअसल पाकिस्तान के सेलिब्रेटी अली हैं। न नर न नारी अली बेगम के नाम से ही टीवी कायॆक्रम होस्ट करते हैं। यह कायॆक्रम पाकिस्तान का सबसे लोकप्रिय राजनीतिक साक्षात्कार कायॆक्रम हैं। इस कायॆक्रम को प्रति सप्ताह करीब तीन करोड़ लोग देखते हैं। अली कहते हैं कि पॉकिस्तान में आतंकवाद, आए दिन होने वाले कत्लेआम, जेहाद इतने बड़े मुद्दे हैं कि एक पुरुष (?) के टीवी पर साड़ी पहन कर राजनीतिक हस्तियों का साक्षात्कार लेना, किसी भी तरह से धार्मिक विरोध की वजह नहीं बन पाया। वह अपने कायॆक्रम और अपने चाहने वालों के बीच खुश हैं। उनकी नजर में पाकिस्तान सिफॆ वैसा नहीं है जैसा मीडिया उसे दिखाता है।
अंतिम और बेहद दिलचस्प तथ्य-
करांची में एक मोहतरमा पाकिस्तान के सबसे हाईटेक ब्यूटी पालॆर की संचालिका हैं। मोटे पैसे वाली महिलाएं इस सैलून में आना अपनी शान समझती हैं लेकिन हो सकता हैं कि इस सैलून में पहली बार पहुंचने वाली कोई महिला डर से चीख पड़े या फिर गश खा कर गिर जाए। दरअसल इस पालॆर की सभी महिलाएं वें हैं जिन्हें उनके शौहर, मंगेतर या प्रेमी ने किसी न किसी कारण से उन्हें तेजाब, एसिड या फिर आग से जला दिया है। यह पॉलॆर अब तक पाकिस्तान की २३४ ऐसी महिलाओं के इलाज पर करोड़ों रुपये खचॆ कर चुका हैं और उन्हें ब्यूटिशयन के तौर पर स्थापित कर चुका है। दूसरे के सौंदयॆ को चार चांद लगाती इस पॉलॆर की ब्यूटिशियन आतिया की एक आंख तेजाब से गल चुकी है। उनके चेहरे का अधिकांश हिस्सी किसी पिघले हुए प्लास्टिक सा उनके गले तक लटका हुआ हैं लेकिन वह खुद को किसी से कम नहीं मानतीं, क्योंकि उनके पास दूसरों को खूबसूरत बनाने का हुनर है।ये तीनों ही बातें हो सकता है आपके के लिए सूचना भर हों लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि कराची में पालॆर चलाने वाली मोहतरमा को भारत में भी अपने पालॆर की फ्रेंचाइजी देनी चाहिए। उन तक तो पूरे पाकिस्तान से सिफॆ २३४ महिलाएं पहुंचीं, यहां तो शायद हर सूबे से इसकी दो-चार गुना महिलाएं अपनों की सताई हुई मिल जाएं। अच्छी सीख तो दुश्मन से भी ली जा सकती हैं, क्या आप मुझसे सहमत हैं ?

Wednesday 5 August 2009

एक पुरानी कविता

मैं हूं किसी तालाब की

अनदेखी लहर,

तुम,

किसी बच्चे के हाथ से

छूटा कंकड़

जो, देता है मुझे विस्तार

किनारों तक...

Tuesday 4 August 2009

पब्लिक प्रॉपर्टी

पिछले दिनों ओशो टाइम्स के एक पुराने संस्करण को सरसरी निगाह से पलटते वक्त ओशो की लाइनें आंखों से होकर दिल में उतर गईं, प्रवाह के साथ बहो, उसका विरोध मत करो। उसका आनंद लो। विरोध में ऊर्जा नष्ट हो जाएगी जबकि साथ बहे तो आनंद दोगुना हो जाएगा। बड़ा कन्फ्यूज था इन लाइनों को लेकर। अगर प्रवाह गलत, विध्वंसकारी और अनुचित हो तब भी क्या विरोध ठीक नहीं। क्या आनंद की तलाश में ऊर्जा का सारा बक्सा छिपा लें और दूसरे लिजलिजे कीड़ों-मकोड़ों की तरह प्रवाह में बह चलें। एक बार भी खुद को याद न आने दें कि हम सिफॆ बहने के लिए नहीं बनें हैं बल्कि ऊपर वाले ने हमें तैरने की भी क्षमता दी है।
इसी ऊहापोह में पिछले तीन-चार दिनों से न कहने का साहस हुआ और न ही सुनने का। पहले अक्षय और फिर पुनीत ने ब्लॉग पर कुछ भी नया न होने की शिकायत दजॆ कराई तो खुद भी गलती का अहसास हुआ। पुनीत ने तो स्नेह में धमकी भी दे डाली कि ब्लॉग बनते ही अब आप पब्लिक पॉपर्टी हैं। इसलिए आपको वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। साथियों ने हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है सो एक बार फिर हाजिर हूं। उम्मीद है दोस्तों के बीच अधिक से अधिक बना रहने की कोशिश करूंगा। इस वायदे के साथ कि प्रवाह के साथ सिफॆ बहूंगा नहीं, जहां ठीक लगेगा, वहां तैरूंगा भी। थोड़ा बहुत नहीं जी भर कर तैरूंगा, भले ही विपरीत प्रवाह मुझे ले ही डूबे।
आपका शेखर

Monday 27 July 2009

चिड़िया के पंख-२(पहला अंक पढ़ने के बाद ही इस अंक से जुड़ पाएंगे )

मैंने अचानक अपने कंधे पर एक कंपकंपाता हाथ मससूस किया था। एक हाथ से अपने बच्चे को गोद में संभाले युवती ने कस कर मेरी शटॆ पकड़ रखी थी। मैं थोड़ा और संयत हो गया। मेरे लिए बाइक चलाना लगातार कठिन होता जा रहा था। घर के बिलकुल करीब पहुंच कर भी घर न पहुंच पाने का दबाव भी था। युवती मुझे रास्ता बताती रही और मैं कच्ची-पक्की गलियों से होता हुआ, एक झोपड़ीनुमा पक्के मकान के सामने रुक गया। वह धीरे से मेरे कंधे का सहारा लेकर उतर गई। बारिश की अथाह बूंदों के बीच भी उसके आंसू बिल्कुल अलग दिख रहे थे। मेरे मुंह से सिफॆ इतना निकला, घर में जाओ मैं अभी उनको लेकर भी आता हूं। उसकी अपलक आंखें बहुत कुछ कह रही थीं। मैंने बाइक मोड़ कर फिर कानपुर रोड पहुंचा। पैदल चलते युवक कुछ आगे आ चुका था। बच्चे की हालत और बुरी हो चुकी थी। मुझे दोबारा देखकर उसने एक गहरी सांस ली। किसी अनजान के साथ रात के ११ बजे पत्नी को भेजने का तनाव कोई भी समझ सकता है। युवक को लेकर करीब आधे घंटे मैं फिर उसी घर के सामने था। युवती घर के बाहर अब भी खड़ी। बच्चा गोद में नहीं था। पती और बच्चे के साथ मुझे देख उसके हाथ अचानक ही जुड़ गए। युवक भी दुआएं देता रहा। घर पहुंचते-पहुंचते साढ़े बारह हो गए। देर होने के कारण पत्नी ही हालत बुरी थी। मुझे देख उनका भय मिश्रित गुस्सा मुझ पर टूट पड़ा। वह खराब मौसम के बाद भी देर से आने के लिए मुझे कोसती रहीं। मैं कुछ नहीं बोला। चुपचाप कपड़े बदलता रहा। कभी एक मैग्जीन में ये लाइनें पढ़ी थीं।चिड़िया पतली से पतली शाख पर भी बेलौस और बिना डरे बैठती है, क्योंकि उसे उस शाख से अधिक भरोसा अपने पंखों पर होता है।मुझे बारिश में भीगी उस चिड़िया के पंखों की मजबूती अब भी कभी-कभी अपने कंधों पर महसूस होती है।

चिड़िया के पंख-१

रविवार को देर रात दफ्तर से लौटते वक्त चौफटका पहुंचा तो सहसा ही एक साल पुराना दिन याद हो आया। नाग पंचमी के दिन चौफटका पर भी गुड़िया का मेला लगता है। कितने साल से, यह तो नहीं पता लेकिन इलाके के जो लोग खुल्दाबाद गुड़िया का मेला देखने नहीं जा पाते हैं, उनके लिए चौफटका के पास सेना के खाली प्लाट में जमा गंदा पानी ही तालाब का मजा देता है। तालाब के किनारे महिला ग्राम स्कूल वाली सड़क को लपेटे मेले की मस्ती कानपुर रोड पर बामुश्किल दो सौ मीटर में ही पूरे शबाब पर होती है। आस-पास की बस्तियों ही नहीं नीवां, कंधईपुर, साकेतनगर और नीम सराय तक के अति सामान्य लोगों के लिए यह खास त्योहार जैसा ही है। इलाके में रहने वाली बड़े घरों की महिलाएं नाग पंचमी के एक दिन पहले से ही थोड़ी चिड़िचिड़ी हो जाती हैं। वजह नाग से दुश्मनी नहीं बल्कि यह कि घर की कामवालियां एक दिन पहले से दो दिन की छुट्टी पर चली जाती हैं। मेले के नाम पर बख्शीश अलग से देनी पड़ती है। इस बार तो नाग पंचमी बड़ा सूखा बीत गया लेकिन जिन्हें पिछली पंचमी याद है उन्हें तूफानी बारिश भी याद होगी। मुझे उस दिन अफिस से निकलने में ही ११ बज गए थे। घर से पत्नी कई बार फोन करके चिंता जता चुकी थीं। अचानक शुरू हुई मूलसाधार बारिश और बिजली की कड़कड़ाहट ने उन्हें भीतर तक डरा दिया था। यही कारण है कि बारिश का मूड अनूकूल न होने के बाद भी मैं आफिस से निकल पड़ा। बारिश ने चौफटका पर मेला तहस-नहस कर दिया था। जिसे जहां जगह मिली वहां सिर छिपा लिया। मेले से कुछ ही आगे बढ़ा था कि बीएसएनएल कालोनी के पास बुरी तरह से भीगे एक परिवार को देख बाइक अपने आप थोड़ी धीमी हो गई। पहला दुबला मुखिया चार साल के बेसुध हो चले बच्चे का हाथ पकड़े उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश कर रहा था। भीषण बारिश में भी जैसे-तैसे माथे तक पल्लू खींचे, उसकी पत्नी गोद में बच्चे समेटे बच्चे को किसी भी तरह बचाने की कोशिश कर रही थी। मुझसे नहीं रहा गया तो बाइक रोक ली। कहां जाओगे, मेरे इस सवाल ने युवक के बारिश से कंपकंपाते शरीर को और भी सिहरा दिया था। धीरे से बोला, नीवां। चलो मैं छोड़ देता हूं। मेरे इस प्रस्ताव पर युवक के पास कुछ पल को तो कोई जवाब नहीं था लेकिन शायद उसने मन ही मन कुछ सोच लिया था। उसने पत्नी और बच्चे को बाइक पर बैठने का संकेत दिया। उसकी पत्नी की आंखों में सवाल और भय की एक लहर एक साथ कौंध गई लेकिन बिना कुछ बोले वह धीरे-धीरे से बाइक पर बैठ गई। मैं बारिश की तेज बूंदों से बंद हो रही पलकों को जैसे-जैसे खोल कर आगे बढ़ गया। प्रीतमनगर मोड़ तक पहुंचते-पहुंचते बाइक के पहिए आधे पानी में डूब चुके थे। कॉलोनी में घुसते ही एक हिचकोले ने मुझे सिहरा दिया।

Sunday 26 July 2009

फांट के लिए धन्यवाद.

जब से ब्लॉग बनाया है। फांट की समस्या से जूझ रहा हूं। अभी -अभी सतीश सर ने यह जादू की पुड़िया दी है। अगर जादू चला तो मेरा काम बहुत आसान हो जाएगा। किसी और को जादू की यह झप्पी चाहिए तो सतीश जी के जादू के बक्से (अरे भाई मोबाइल) पर घंटी बजा सकता है।

बस्ते में कंञ्डोम

बहुत दिन बाद छुट्टी का सदुपयोग करने शनिवार को बिना बताए एक पुराने मित्र केञ् घर गया था। दुनिया से अलग 'अवकाश चक्रञ्' होने केञ्ञ्कारण मुझे इस तरह अचानक अपने दरवाजे पर देख वे कुञ्छ अकबकाए तो लेकिन भले मानस की तरह दांत दिखाते हुए स्वागत करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। मित्र की पत्नी शहर केञ् एक औसत दर्जे केञ् स्कूञ्ल में पढ़ाती हैं। चारलृछह हजार की पगार में जीवन की पूरी ऊर्जा चूस लेने की स्कूञ्ल प्रबंधकों को लेकर उनकी खुन्नस अタसर उनकी बातों में दिखती थी लेकिन शनिवार शायद कुञ्छ ज्यादा बुरा था। औपचारिक बातचीत केञ् बीच आई बेस्वाद चाय और कुञ्छ सिल चुकेञ् बिस्कुञ्ट उनकेञ् गुस्से को साफ बयां कर रहे थे। मुझे भाभी जी केञ् गुस्से का अंदाजा तब ही हो गया था जब 'सुनो जी' की हांक केञ् बीच कुञ्छ क्षण केञ् लिए किचन में गए। लौटे तो चेहरा फक था। उन्होंने झेंप मिटाते हुए कहा था, बहुत थक गई है आज। मैनेजर ने अचानक ही आज बैग चेकिंग में लगा दिया था, यह भी कोई टीचर का काम हैं। 'सब साले....' मैंने बीच में टोक दिया। छोडि़ए भाई साहब। प्राइवेट नौकरी में ये सब तो झेलना ही पड़ता है।
माहौल सहज हुआ तो बात आगे बढ़ गई। ये बैग चेकिंञ्ग का タया मामला था भाभी जी। पहले तो वे कुञ्छ संकोच में पड़ीं लेकिन धीरेलृधीरे गुस्से की असल वजह परत दर परत बाहर निकलने लगी। 'नौवींलृदसवीं केञ् लड़केञ्लृलड़कियां और उनका दिमाग तो देखो...स्कूञ्ल बैग में जितने नोट्स नहीं हैं, उतने तो लव लेटर हैं। गोलाप्रकार लाना भूल गईं लेकिन लिपस्टिक और आईलृलाइनर लाना नहीं भूलीं.... देखो तो बद्तमीजी, १०वीं का लड़का बैग में कंञ्डोम लेकर आया था.....' धारा प्रवाह बोलती उनकी जुबान सहसा अटक सी गई। कंञ्डोम का नाम बिंदास बोलने का नारा शायद उनकेञ् गले नहीं उतरा था, सो वह कुञ्छ असहज हो गईं। माहौल फिर थोड़ा भारी हो गया। मैं भी बहुत देर तक बैठने की हिमत नहीं जुटा पाया और दुआलृसलाम करकेञ् निकल पड़ा। रात भी ठीक ढंग से सो नहीं सका। 'बस्ते का कंञ्डोम' अब भी मेरे जेहन में किसी गुबारे सा ड्डूञ्लता जा रहा है, हर पल कुञ्छ और बड़ा।

Friday 24 July 2009

''मेरे दोस्त
मुझे अभी मत देना
शुभकामनाएं
मैं जानता हूं
कोख में ही कर दी जाएगी
इसकेञ् भ्रूण की हत्या
अभी शनि की साढ़े साती है
तो राहुलृकेञ्तु भी 
भाग्योदय केञ् द्वार पर ही अड़े हैं
अभी नタकारखाने में तूती की तरह
अनसुनी कर दी जाएंगी प्रार्थनाएं
अभी रखने दो
किसी 'आका' को सिर पर हाथ
अभी उगने दो वर्तमान की タयारियों में
मंगलकामनाओं की फसल
अभी प्रतीक्षा करो, धैर्य से
अनुकूञ्ल स्थितियों केञ् आने तक''

अपने रचना कर्म से हमेशा मेरे मन पर गहरे असर डालने वाले साथी अनिल सिद्धार्थ से उनकी ये पंタतियां आज जबरन मांगी। उन्होंने भी सह्दयता से अपने व्यस्त समय में से कुञ्छ क्षण निकाल कर मुझ पर कृञ्पा की और मेरे लॉग की शुभकामना केञ् रूञ्प में अपनी ये प्रिय पंタतियां मुझे सौंप दी। उमीद करता हूं मुझ कच्चे की लेखनी को इस शानदार लाइनों से कुञ्छ रंग मिल जाएगा।
कुञ्छ युवाओं ने आज राष्ट्रध्वज केञ् समान केञ् लिए अलग तरह का अभियान शुरूञ् किया है। वे तिरंगे को इलाहाबाद से यमुना पुल पर लगवाना चाहतें हैं। उन्होंने इसकेञ् लिए बाकायदा हस्ताक्षर अभियान भी शुरूञ् किया है। दोपहर करीब एक बजे इस अभियान का नेतृत्व कर रहा अभिषेक विश्वविद्दयालय पहुंचने वाले युवाओं, शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों (कुञ्छ मीडियाकर्मियों से भी) इस अभियान केञ् लिए दस्तखत करने का अनुरोध कर रहा था। इस अपील केञ् जवाब में मुंह बिसूरते, बगलें झांकते और कन्नी काटते लोगों को देख कर जी मितला गया। किस युवा भारत की बात करते हैं हम। タया सिर्ड्डञ् पंद्रह अगस्त और छबीस जनवरी ही, तिरंगे पर सलामी ठोंकने केञ् लिए हैं। समलैगिंकता, मंदिरलृमसजिद या फिर किसी भी छोटे और कम महत्व केञ् कारणों पर भी उबल जाने वाले तथाकथित स्वाभिमानी देश केञ् स्वाभिमान केञ् नाम पर कहां चले जाते हैं।

pahalee bat

बहुत् दिनो से सोच् रहा था कि मेर भि एक् ब्लोग हो।पुनीत् ने जोर् देकर् कहा कि आज् सत्यर्थ से जरूर् मि लिय जाये सो मन् बन् गया। आज चाहे जो हो अपना ब्लोग् जरूर शुरु करूगा। सन्यओग से अंमित् ने मद्द कि और इस्के ह्री गणेश भि हो गया। काफी रोमनचित हू। उम्मीद् कर्ता हू ये दोस्ती साथ् रहेगी। 

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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