Tuesday, 4 August, 2009

पब्लिक प्रॉपर्टी

पिछले दिनों ओशो टाइम्स के एक पुराने संस्करण को सरसरी निगाह से पलटते वक्त ओशो की लाइनें आंखों से होकर दिल में उतर गईं, प्रवाह के साथ बहो, उसका विरोध मत करो। उसका आनंद लो। विरोध में ऊर्जा नष्ट हो जाएगी जबकि साथ बहे तो आनंद दोगुना हो जाएगा। बड़ा कन्फ्यूज था इन लाइनों को लेकर। अगर प्रवाह गलत, विध्वंसकारी और अनुचित हो तब भी क्या विरोध ठीक नहीं। क्या आनंद की तलाश में ऊर्जा का सारा बक्सा छिपा लें और दूसरे लिजलिजे कीड़ों-मकोड़ों की तरह प्रवाह में बह चलें। एक बार भी खुद को याद न आने दें कि हम सिफॆ बहने के लिए नहीं बनें हैं बल्कि ऊपर वाले ने हमें तैरने की भी क्षमता दी है।
इसी ऊहापोह में पिछले तीन-चार दिनों से न कहने का साहस हुआ और न ही सुनने का। पहले अक्षय और फिर पुनीत ने ब्लॉग पर कुछ भी नया न होने की शिकायत दजॆ कराई तो खुद भी गलती का अहसास हुआ। पुनीत ने तो स्नेह में धमकी भी दे डाली कि ब्लॉग बनते ही अब आप पब्लिक पॉपर्टी हैं। इसलिए आपको वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। साथियों ने हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है सो एक बार फिर हाजिर हूं। उम्मीद है दोस्तों के बीच अधिक से अधिक बना रहने की कोशिश करूंगा। इस वायदे के साथ कि प्रवाह के साथ सिफॆ बहूंगा नहीं, जहां ठीक लगेगा, वहां तैरूंगा भी। थोड़ा बहुत नहीं जी भर कर तैरूंगा, भले ही विपरीत प्रवाह मुझे ले ही डूबे।
आपका शेखर

3 comments:

  1. Are Ghabarate Kyon ho Bhai. Hum log hein na. Doobne Thode hi denge.

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  2. chalo ,itne dino baad kuchh likha to sahi ,varna ham to soach rahe the paristhitiyon ki maar ne duba diya....!PAR AAP TO TAIRTE HUE DIKHE!

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  3. pravah ke vipreet tairna to phitrat hai apki. aur mera manna hai ki apne man ki karne mai urja nasht nahi hoti balki urja ka sanchay hota hai.is liye urjavan vayakti doobte nahi balki par hote hai ya phir naye tapuoon ki khoj karte hai.alag bilkul alag............

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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