Sunday, 30 August, 2009

खिड़की

खिड़की बाहर खुलती है वह अंदर को बाहर देखने के जरिये जोड़ती है। बाहर है यह अंदर को याद रहे। बाहर को यह अहसास बना रहे कि अंदर है। खिड़की अंदर और बाहर दोनों को एक दूसरे का एहतराम करने का एक सीधा-साधा अवसर है। आकाश हर घर पर छाया है पर कई बार वह खिड़की से दिख पड़ता है। खिड़की के द्वारा घर आकाश को याद करता है। यह भी कि आकाश खिड़की से होकर घर से अंतरंग बनकर प्रवेश करता है। खिड़की से जो बाहर का दृश्य का दिख पड़ता है वह चुपचाप घर में दाखिल हो जाता है। उसी रास्ते के अंदर जो हो रहा है उसका कुछ हिस्सा फिसल जाता है। कई बार घर के अंदर से हम खिड़की के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ देख पाते हैं जिसे हमने देखा। यह न देखे हुए को पता, न किसी और को। खिड़की एक गोपन दृष्टि हो सकती है। एक आँख जो देखती है और जिसे देखते हुए कोई और नहीं देख पाता। खिड़की रहस्य को छिपाना और भेद का न खोलना जानती है। अगर वह चाहे तो भेद खोल भी सकती है। खिड़की खतरनाक हो सकती है। कविता संसार की अनंत पर खिड़की है। उस निरंतरता को जो है, हम अगर यह खिड़की न होती तो शायद अलक्षित ही जाने देते। हम चाहें तो इस खिड़की से दृश्यावलोकन कर सकते हैं। हम अनंत देख सकते हैं। पर खिड़की का दृश्यता का और अनंत का होना हमारे झांकने पर निर्भर नहीं है। खिड़की झाँकने का न्यौता है। हो सकता है कि हमे न्यौते को स्वीकार करने मे देर हो जाए। पर इस देरी से फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि कविता जिस अनंत पर खिड़की है वह बीतता नहीं है। पर झाँकना करना भी है-जो दूर देखता है वह हिस्सेदार नहीं है, यह धारणा निराधार है। झाँकते हुए हम दृश्य मे शामिल हो जाते हैं। कविता भवसागर पार करने की नौका नहीं है पर वह भवसागर की मंझधार में अनंत पा लेने का दुस्साहस जरूर है। वह जो पार और सुदूर है उसे सामने और पास लाना है-कम से कम उसकी अथक चेष्टा है।

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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