Monday, 31 August, 2009

फुरसतिया के ब्लॉग से।

जो बीच भंवर इठलाया करते ,
बांधा करते है तट पर नांव नहीं।
संघर्षों के पथ के यायावर ,
सुख का जिनके घर रहा पडाव नहीं।
जो सुमन बीहडों में वन में खिलते हैं
वो माली के मोहताज नहीं होते,
जो दीप उम्र भर जलते हैं
वो दीवाली के मोहताज नहीं होते।

मानसिक हलचल में पढ़ा

कोई वर्तमान नहीं है। केवल भूत है या भविष्य। आप चाहे जितना बारीकी से समय को छीलें, या तो वह हो चुका है, या होगा। तब वे लोग जो दावा करते हैं कि वे वर्तमान में जीते हैं, किसमें रहते हैं? भूतकाल उन्हें संज्ञाशून्य कर देता है यह विश्वास करने में कि वह अब भी चल रहा है। और वे उसे वर्तमान कहते।समय उड़ रहा है। भविष्य तेजी से भूतकाल बन रहा अपने भूतकाल की उपलब्धियों पर विश्राम करना सरल है। यह और भी सरल है कि कोसा जाये भविष्य के अंधकार।

Sunday, 30 August, 2009

खिड़की

खिड़की बाहर खुलती है वह अंदर को बाहर देखने के जरिये जोड़ती है। बाहर है यह अंदर को याद रहे। बाहर को यह अहसास बना रहे कि अंदर है। खिड़की अंदर और बाहर दोनों को एक दूसरे का एहतराम करने का एक सीधा-साधा अवसर है। आकाश हर घर पर छाया है पर कई बार वह खिड़की से दिख पड़ता है। खिड़की के द्वारा घर आकाश को याद करता है। यह भी कि आकाश खिड़की से होकर घर से अंतरंग बनकर प्रवेश करता है। खिड़की से जो बाहर का दृश्य का दिख पड़ता है वह चुपचाप घर में दाखिल हो जाता है। उसी रास्ते के अंदर जो हो रहा है उसका कुछ हिस्सा फिसल जाता है। कई बार घर के अंदर से हम खिड़की के माध्यम से ऐसा बहुत कुछ देख पाते हैं जिसे हमने देखा। यह न देखे हुए को पता, न किसी और को। खिड़की एक गोपन दृष्टि हो सकती है। एक आँख जो देखती है और जिसे देखते हुए कोई और नहीं देख पाता। खिड़की रहस्य को छिपाना और भेद का न खोलना जानती है। अगर वह चाहे तो भेद खोल भी सकती है। खिड़की खतरनाक हो सकती है। कविता संसार की अनंत पर खिड़की है। उस निरंतरता को जो है, हम अगर यह खिड़की न होती तो शायद अलक्षित ही जाने देते। हम चाहें तो इस खिड़की से दृश्यावलोकन कर सकते हैं। हम अनंत देख सकते हैं। पर खिड़की का दृश्यता का और अनंत का होना हमारे झांकने पर निर्भर नहीं है। खिड़की झाँकने का न्यौता है। हो सकता है कि हमे न्यौते को स्वीकार करने मे देर हो जाए। पर इस देरी से फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि कविता जिस अनंत पर खिड़की है वह बीतता नहीं है। पर झाँकना करना भी है-जो दूर देखता है वह हिस्सेदार नहीं है, यह धारणा निराधार है। झाँकते हुए हम दृश्य मे शामिल हो जाते हैं। कविता भवसागर पार करने की नौका नहीं है पर वह भवसागर की मंझधार में अनंत पा लेने का दुस्साहस जरूर है। वह जो पार और सुदूर है उसे सामने और पास लाना है-कम से कम उसकी अथक चेष्टा है।

खुराक

चमन (रमन से)- देखो पेपर में न्यूज आई है कि साइंटिस्ट लोग पता लगा रहे है कि कोई आदमी बिना दिमाग के कितने दिन जिंदा रह सकता है।
रमन (चमन से)- इसका जवाब तो बड़ा आसान है, तू बस उन्हें अपनी उम्र बता दें।

अनदेखी का शिकार पुरामहत्व स्मारक

विश्व विख्यात स्वर्ण नगरी जैसलमेर के विभिन्न भागों में प्राचीन एवं ऐतिहासिक धरोहरों का भंडार है, लेकिन अतीत की कहानी सुनाने वाली इन इमारतों की लगातार अनदेखी को रोका नहीं गया तो पुरामहत्व की अनमोल धरोहर के लिए खतरा खड़ा हो सकता है।
स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों किलों, हवेलियों और छतरियों से अटे जैसलमेर में स्थित विश्व विख्यात सोनार किले के संरक्षण को लेकर कोई विशेष प्रयास नहीं हुए है। यह सिर्फ जैसलमेर के सोनार किले की कहानी नहीं है, बल्कि जिले में कई दुर्ग भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे है। जैसलमेर में सैकड़ों शानदार प्राचीन व ऐतिहासिक स्मारक हैं और इसी विरासत के बलबूते पर विश्व के पर्यटन मानचित्र पर यह स्वर्ण नगरी उभरी है, लेकिन इन स्मारकों के संरक्षण व रखरखाव के लिए प्रशासनिक स्तर पर किसी प्रकार की पहल दिखाई नहीं दे रही है।
जैसलमेर के इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा का कहना है कि जैसलमेर विश्व धरोहर के क्षेत्र में अपनी एक अहम पहचान रखता है, लेकिन यहां की सांस्कृतिक धरोहर को विरासत के रूप में सहेज कर रखने के कोई महत्वपूर्ण प्रयास नहीं किए गए हैं। राज्य सरकार व केंद्र सरकार द्वारा प्राचीन धरोहरों के संरक्षण के लिए बना गए विभाग नाम मात्र के है।
जैसलमेर में सात हवेलियों का समूह है। सरकार ने वर्ष 1976 में तीन पूर्ण एवं एक हवेली का 42 प्रतिशत भाग अधिग्रहित किया था, लेकिन आज तक इनके संरक्षण के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। 'लिपिंग फोर्ट' के रूप में विश्व विख्यात जैसलमेर के 'सोनार किले' के संरक्षण के लिए योजनाएं बनीं, लेकिन उन पर सही रूप से अमल नहीं किया गया।
नगर पालिका व पुरातत्व विभाग में तालमेल नहीं होने से दुर्ग से पानी की निकासी की अव्यवस्था कोढ में खाज का काम कर रही है। कुछ समय पहले पुरामहत्व के स्मारकों को संवारने का काम करने वाले एक संगठन के माध्यम से तथा नगरपालिका और पुरातत्व विभाग ने सोनार किले पर करोड़ों रुपये खर्च किए, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित दुर्ग जर्जर हो रहे हैं। जैसलमेर जिले के मानगढ, नाचना, हड्डा किशनगढ, काणोद, लखा आदि गांवों में कई दुर्ग हैं। जैसलमेर पर्यटन व्यवसाय महासंघ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह राठौड़ का मानना है कि सरकार एवं विरासत प्रेमी संस्थाओं द्वारा प्राचीन धरोहरों के लिए जो कुछ भी किया जा रहा है उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी जरूरी है। पर्यटकों का मानना है कि प्राचीन धरोहरों व स्मारकों की अनदेखी से यहां के पर्यटन को खतरा है।
अगर ऐतिहासिक विरासत को सहेजने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब इन विरासतों का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। ऐसे में जैसलमेर के ही नहीं बल्कि भारत के पर्यटन को बहुत बड़ा झटका लग सकता है।

Friday, 7 August, 2009

हाईकू

व्यस्तताओं में पूरा दिन रेत सा जाने कब बीत गया कि पालथी मार कर आपके साथ बैठने का वक्त ही नहीं मिला। फिर भी एक हाईकू आपके लिए----

मैं चूम लेता हूं
पवनदूती के अधरों को अक्सर
मुझे पता है,
तुम भी चूमती हो....

Thursday, 6 August, 2009

नए नजरिए से पाकिस्तान

बुधवार को जल्दी घर पहुंचने के वायदे के बाद भी काफी देर हो गई। घर पहुंचते-पहुंचते घड़ी की सूइयां १२ का साथ छोड़ चुकी थीं सो बीवी से सिफॆ गुडनाइट ही हो सकी। मतलब यह कि देर से आने के कारण पड़ने वाली डांट से बच गया।खाने के बाद रोज की शगल में रिमोट के बटन के साथ छेड़छाड़ के बीच एक कायॆक्रम पर आंखे रुक गईं। नैटजियो की फेमस सिरीज डोंट टेल माई मदर में इस बार पाकिस्तान की बारी थी। पाकिस्तान के बारे में जब भी, जितना भी पढ़ो मन नहीं भरता। हमेशा और जानने की इच्छा होती है, (पट्टिदार जो ठहरा) , सो आंखें टीवी से चिपक गई। एक घंटा जाने कब बीत गया पता ही नहीं चला। इस दौरान पाकिस्तान को बिल्कुल नए नजरिए से देखने को मिला। ऐसे फैक्ट जो सालों से सूचनाओं के बाजार में रहने के बाद भी मेरी जानकारी में नहीं थे।
तथ्य एक-
करांची में हैदर भाई की वकॆशॉप हैं। यूं तो यह एक लेदर फैक्ट्री है, जहां हर रोज करीब सवा सौ महिलाएं (इनमें १२ सौ १४ वषॆ की लड़िकयां भी शामिल हैं) में चमड़े के सामान बनती हैं। कुछ नकाब, स्कटॆ नुमा ड्रेस, कोड़े या ऐसी ही कुछ और चीजें। दरअसल यह वकॆशॉप अमेरिका, मलयेशिया, थाईलैंड, चीन जैसे देशों के अधिकृत या अनाधिकृत सेक्स स्टोसॆ के लिए सेक्स ट्वॉय बनाती हैं। धमॆ को लेकर बेहद कट्टर छवि वाले पाकिस्तान जैसे देश में ऐसे कारोबार की कल्पना भी अजीब लगती हैं। हैदर बताते हैं कि वर्कशॉप में काम करने वाली किसी भी महिला को यह नहीं पता कि वह जो चीजें बना रहीं हैं, उसका इस्तेमाल क्या है। यह काम उनके लिए सिफॆ काम है। उनका मानना है कि कोई भी धमॆ कोई काम करने से नहीं रोक सकता।
तथ्य दो-
पिछले दिनों भारत के एक लोकप्रिय टीवी चैनल ने बेगम कायॆक्रम प्रस्तुत किया। इसमें जॉन इब्राहिम से लेकर अभिषेक बच्चन तक साक्षात्कार को पहुंचे। काफी हॉट और ब्यूटीफुल मानी गई इस कायॆक्रम की होस्ट बेगम को लेकर अस्सी फीसदी लोग अब भी अनजान हैं। कुछ उन्हें एक सेक्सी ओल्ड एज महिला के तौर पर जानते हैं तो कुछ औरत के वेष में पुरुष। लेकिन इस कायॆक्रम को होस्ट करने वाली बेगम दरअसल पाकिस्तान के सेलिब्रेटी अली हैं। न नर न नारी अली बेगम के नाम से ही टीवी कायॆक्रम होस्ट करते हैं। यह कायॆक्रम पाकिस्तान का सबसे लोकप्रिय राजनीतिक साक्षात्कार कायॆक्रम हैं। इस कायॆक्रम को प्रति सप्ताह करीब तीन करोड़ लोग देखते हैं। अली कहते हैं कि पॉकिस्तान में आतंकवाद, आए दिन होने वाले कत्लेआम, जेहाद इतने बड़े मुद्दे हैं कि एक पुरुष (?) के टीवी पर साड़ी पहन कर राजनीतिक हस्तियों का साक्षात्कार लेना, किसी भी तरह से धार्मिक विरोध की वजह नहीं बन पाया। वह अपने कायॆक्रम और अपने चाहने वालों के बीच खुश हैं। उनकी नजर में पाकिस्तान सिफॆ वैसा नहीं है जैसा मीडिया उसे दिखाता है।
अंतिम और बेहद दिलचस्प तथ्य-
करांची में एक मोहतरमा पाकिस्तान के सबसे हाईटेक ब्यूटी पालॆर की संचालिका हैं। मोटे पैसे वाली महिलाएं इस सैलून में आना अपनी शान समझती हैं लेकिन हो सकता हैं कि इस सैलून में पहली बार पहुंचने वाली कोई महिला डर से चीख पड़े या फिर गश खा कर गिर जाए। दरअसल इस पालॆर की सभी महिलाएं वें हैं जिन्हें उनके शौहर, मंगेतर या प्रेमी ने किसी न किसी कारण से उन्हें तेजाब, एसिड या फिर आग से जला दिया है। यह पॉलॆर अब तक पाकिस्तान की २३४ ऐसी महिलाओं के इलाज पर करोड़ों रुपये खचॆ कर चुका हैं और उन्हें ब्यूटिशयन के तौर पर स्थापित कर चुका है। दूसरे के सौंदयॆ को चार चांद लगाती इस पॉलॆर की ब्यूटिशियन आतिया की एक आंख तेजाब से गल चुकी है। उनके चेहरे का अधिकांश हिस्सी किसी पिघले हुए प्लास्टिक सा उनके गले तक लटका हुआ हैं लेकिन वह खुद को किसी से कम नहीं मानतीं, क्योंकि उनके पास दूसरों को खूबसूरत बनाने का हुनर है।ये तीनों ही बातें हो सकता है आपके के लिए सूचना भर हों लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि कराची में पालॆर चलाने वाली मोहतरमा को भारत में भी अपने पालॆर की फ्रेंचाइजी देनी चाहिए। उन तक तो पूरे पाकिस्तान से सिफॆ २३४ महिलाएं पहुंचीं, यहां तो शायद हर सूबे से इसकी दो-चार गुना महिलाएं अपनों की सताई हुई मिल जाएं। अच्छी सीख तो दुश्मन से भी ली जा सकती हैं, क्या आप मुझसे सहमत हैं ?

Wednesday, 5 August, 2009

एक पुरानी कविता

मैं हूं किसी तालाब की

अनदेखी लहर,

तुम,

किसी बच्चे के हाथ से

छूटा कंकड़

जो, देता है मुझे विस्तार

किनारों तक...

Tuesday, 4 August, 2009

पब्लिक प्रॉपर्टी

पिछले दिनों ओशो टाइम्स के एक पुराने संस्करण को सरसरी निगाह से पलटते वक्त ओशो की लाइनें आंखों से होकर दिल में उतर गईं, प्रवाह के साथ बहो, उसका विरोध मत करो। उसका आनंद लो। विरोध में ऊर्जा नष्ट हो जाएगी जबकि साथ बहे तो आनंद दोगुना हो जाएगा। बड़ा कन्फ्यूज था इन लाइनों को लेकर। अगर प्रवाह गलत, विध्वंसकारी और अनुचित हो तब भी क्या विरोध ठीक नहीं। क्या आनंद की तलाश में ऊर्जा का सारा बक्सा छिपा लें और दूसरे लिजलिजे कीड़ों-मकोड़ों की तरह प्रवाह में बह चलें। एक बार भी खुद को याद न आने दें कि हम सिफॆ बहने के लिए नहीं बनें हैं बल्कि ऊपर वाले ने हमें तैरने की भी क्षमता दी है।
इसी ऊहापोह में पिछले तीन-चार दिनों से न कहने का साहस हुआ और न ही सुनने का। पहले अक्षय और फिर पुनीत ने ब्लॉग पर कुछ भी नया न होने की शिकायत दजॆ कराई तो खुद भी गलती का अहसास हुआ। पुनीत ने तो स्नेह में धमकी भी दे डाली कि ब्लॉग बनते ही अब आप पब्लिक पॉपर्टी हैं। इसलिए आपको वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। साथियों ने हिम्मत कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है सो एक बार फिर हाजिर हूं। उम्मीद है दोस्तों के बीच अधिक से अधिक बना रहने की कोशिश करूंगा। इस वायदे के साथ कि प्रवाह के साथ सिफॆ बहूंगा नहीं, जहां ठीक लगेगा, वहां तैरूंगा भी। थोड़ा बहुत नहीं जी भर कर तैरूंगा, भले ही विपरीत प्रवाह मुझे ले ही डूबे।
आपका शेखर

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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