Monday 27 July 2009

चिड़िया के पंख-१

रविवार को देर रात दफ्तर से लौटते वक्त चौफटका पहुंचा तो सहसा ही एक साल पुराना दिन याद हो आया। नाग पंचमी के दिन चौफटका पर भी गुड़िया का मेला लगता है। कितने साल से, यह तो नहीं पता लेकिन इलाके के जो लोग खुल्दाबाद गुड़िया का मेला देखने नहीं जा पाते हैं, उनके लिए चौफटका के पास सेना के खाली प्लाट में जमा गंदा पानी ही तालाब का मजा देता है। तालाब के किनारे महिला ग्राम स्कूल वाली सड़क को लपेटे मेले की मस्ती कानपुर रोड पर बामुश्किल दो सौ मीटर में ही पूरे शबाब पर होती है। आस-पास की बस्तियों ही नहीं नीवां, कंधईपुर, साकेतनगर और नीम सराय तक के अति सामान्य लोगों के लिए यह खास त्योहार जैसा ही है। इलाके में रहने वाली बड़े घरों की महिलाएं नाग पंचमी के एक दिन पहले से ही थोड़ी चिड़िचिड़ी हो जाती हैं। वजह नाग से दुश्मनी नहीं बल्कि यह कि घर की कामवालियां एक दिन पहले से दो दिन की छुट्टी पर चली जाती हैं। मेले के नाम पर बख्शीश अलग से देनी पड़ती है। इस बार तो नाग पंचमी बड़ा सूखा बीत गया लेकिन जिन्हें पिछली पंचमी याद है उन्हें तूफानी बारिश भी याद होगी। मुझे उस दिन अफिस से निकलने में ही ११ बज गए थे। घर से पत्नी कई बार फोन करके चिंता जता चुकी थीं। अचानक शुरू हुई मूलसाधार बारिश और बिजली की कड़कड़ाहट ने उन्हें भीतर तक डरा दिया था। यही कारण है कि बारिश का मूड अनूकूल न होने के बाद भी मैं आफिस से निकल पड़ा। बारिश ने चौफटका पर मेला तहस-नहस कर दिया था। जिसे जहां जगह मिली वहां सिर छिपा लिया। मेले से कुछ ही आगे बढ़ा था कि बीएसएनएल कालोनी के पास बुरी तरह से भीगे एक परिवार को देख बाइक अपने आप थोड़ी धीमी हो गई। पहला दुबला मुखिया चार साल के बेसुध हो चले बच्चे का हाथ पकड़े उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश कर रहा था। भीषण बारिश में भी जैसे-तैसे माथे तक पल्लू खींचे, उसकी पत्नी गोद में बच्चे समेटे बच्चे को किसी भी तरह बचाने की कोशिश कर रही थी। मुझसे नहीं रहा गया तो बाइक रोक ली। कहां जाओगे, मेरे इस सवाल ने युवक के बारिश से कंपकंपाते शरीर को और भी सिहरा दिया था। धीरे से बोला, नीवां। चलो मैं छोड़ देता हूं। मेरे इस प्रस्ताव पर युवक के पास कुछ पल को तो कोई जवाब नहीं था लेकिन शायद उसने मन ही मन कुछ सोच लिया था। उसने पत्नी और बच्चे को बाइक पर बैठने का संकेत दिया। उसकी पत्नी की आंखों में सवाल और भय की एक लहर एक साथ कौंध गई लेकिन बिना कुछ बोले वह धीरे-धीरे से बाइक पर बैठ गई। मैं बारिश की तेज बूंदों से बंद हो रही पलकों को जैसे-जैसे खोल कर आगे बढ़ गया। प्रीतमनगर मोड़ तक पहुंचते-पहुंचते बाइक के पहिए आधे पानी में डूब चुके थे। कॉलोनी में घुसते ही एक हिचकोले ने मुझे सिहरा दिया।

1 comment:

  1. इलाहाबाद में पिछले 15 साल से हूँ, किन्‍तु सिर्फ एक बार ही ग‍ुडिया के मेले में जाना हो पाया।

    परोपकार करने में कोई हर्ज नही है किन्‍तु परोपकार सुपात्र के प्रति किया जाना चाहिये, कही ऐसा न हो कि जिसे हम सहूलियत दे वही कहीं हमें लूट न ले।

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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