Monday 13 June 2011





















टीम के बगैर कोई भी उल्लास संभव नहीं। उल्लास इस वर्ष मां तुझे प्रणाम की पहली कड़ी थी, इसलिए हम सब की दिल की धड़कनें तेज थीं। सारा ध्यान इस बात पर था कि हम पिछले साल के मुकाबले बड़ी लाइन खींचें और हमें गहरा संतोष है कि हम इसमें कामयाब हुए। जाहिर तौर पर इस जीत का श्रेय हमारे मुखिया संपादक श्री सूर्यकांत द्विवेदी जी और पूरी टीम को है। खास तौर पर महिला मंडल रजनी, शालू, आरती, पारुल, वंदना, सुचित्रा और जिनके भी नाम मुझे पता नहीं है, उनके बगैर यह कार्यक्रम सफल नहीं हो पाता। एक विशेष धन्यवाद भाई शादाब को, जो हर वक्त मुझे अपने कंधे से कंधा मिलाए खड़े दिखाई देते हैं। चाहे नए लोगों से परिचय कराना हो या किसी जानकारी में संशोधन, वह बिना हिचक मुझे करेक्ट करते रहते हैं। और हां, ये उनकी धमकी का ही असर है कि छायाकार साथी सुनील और चंद्रकांत हमारी भी तस्वीरें गाहे-बगाहे खीच ले रहे हैं। कम से कम ब्लॉग के लिए कुछ तो मिला।

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खुद को समझने की कोशिश लंबे समय से कर रहा हूं। जितना जानता हूं उतने की बात करूं तो स्कूल जाने के दौरान ही शब्दों को लय देने का फितूर साथ हो चला। बाद में किसी दौर में पत्रकारिता का जुनून सवार हुआ तो परिवार की भौंहे तन गईं फिर भी १५ साल से अपने इस पसंदीदा प्रोफेशन में बना (और बचा हुआ) हूं, यही बहुत है। अच्छे और ईमानदार लोग पसंद हैं। वैसा ही रहने की कोशिश भी करता हूं। ऐसा बना रहे, यही कामना है।
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